सोमवार, 9 जुलाई 2018

2015 की एक यात्रा: पार्ट-2

(अब मैं मानो मझधार में फंस चुका था...)
ट्रेन में मुझे दूसरी बार चक्‍कर आ चुका था। परेशान से ज्‍यादा मैं हैरान था। लोगों ने फिर से मुझे उठाकर पास की सीट पर बैठा दिया था। ऐसा भी नहीं था कि मुझे किसी प्रकार की कमजोरी महसूस हो रही हो। मैं साधारण तरीके से चल और उठ-बैठ रहा था। दिमाग सेंटर में आने के बाद मैं वापस अपनी सीट पर लौट गया। आगे की यात्रा करने की हिम्‍मत कुछ कमजोर पड़ रही थी, लेकिन मैं मन को समझा रहा था कि नहीं मैं तो जाऊंगा ही।
मुझे थोड़ा उदास देखकर पास में बैठे सज्‍जन ने पूछ लिया कि क्‍या हो गया परेशान दिख रहे हो। इससे पहले हुई वार्तालाप में मैंने उनसे यह साझा नहीं किया था कि मैं काठमांडु जा रहा हूं। लेकिन मैंने उन्‍हें दोबारा चक्‍कर आने की बात साझा करने के यह भी बता दिया कि मैं काठमांडु के लिए निकला हूं। इस पर उन्‍होंने मुझे काठमांडु का सफर न करने की सलाह दी। उन्‍होंने कहा कि सोनौली बॉर्डर पार करने के बाद काठमांडु पहुंचने के लिए कई घंटे का पर्वतीय सफर तय करना होगा। मुझे पहले से चक्‍कर आ रहे हैं और मैं अकेला भी हूं, ऐसे में परेशानी बढ़ सकती है। और फिर मैं दूसरे देश में भी जा रहा हूं, इसलिए मुझे यह जोखिम नहीं लेना चाहिए।
मैं सोच में पड़ गया कि अब आखिर मैं क्‍या करूं। लगभग आधा सफर मैं तय कर चुका था। यहां से वापस भी कैसे लौटूं। इसके बाद मन में अजीब-अजीब खयाल घर करने लगे।
ट्रेन का टिकट मैंने घर यानी कि हरदोई से ही कराया था। मुझे 150 से ज्‍यादा की वेटिंग मिली थी। इसके बावजूद मेरी टिकट कन्‍फर्म हो गई थी। इसे भी मैं पशुपतिनाथ बाबा की कृपा ही मान रहा था। अकेले इनते लंबे सफर पर निकलने का यह मेरा पहला अनुभव था और मैं अब मानो मझधार में फंस चुका था। अंत में मैंने फैसला किया कि गोरखपुर में उतरने के बाद आगे के बारे में सोचूंगा। वहीं, साथ में बैठे सज्‍जन मुझे सलाह दे रहे थे कि मैं अगली ट्रेन से वापस लौट जाऊं या डॉक्‍टर से परामर्श लेकर दवा लूं और गोरखपुर में ही होटल लेकर आराम करूं व अगले दिन ट्रेन से घर चला जाऊं।
इन सब उधेड़-बुनों के बीच ट्रेन गोरखपुर पहुंच गई। रेलवे स्‍टेशन से बाहर आते ही मैंने अपने एक डॉक्‍टर दोस्‍त को कॉल किया। उसे पूरी समस्‍या से अवगत कराया। उसने कमजोरी की वजह से ऐसा होने की आशंका व्‍यक्‍त की और ज्‍यूस पीने व कुछ हलका खा लेने की सलाह दी। मैंने स्‍टेशन परिसर से बाहर आकर एक बड़ा गिलास अनार का ज्‍यूस निकलवाया और पी गया। जैसे ही ज्‍यूस वाले को पैसे दिए, मुझे जोस से उल्‍टी आई। मैं वहीं बैठ गया। लगभग सारा ज्‍यूस बाहर आ चुका था। सिर सुन हो गया और मैं थोड़ा घबरा गया। एक उलटी से ही हालत ऐसी हो गई कि उठने की हिम्‍मत नहीं हो रही थी। आसपास से लोग गुजर रहे थे, लेकिन कोई पानी देने वाला तक नहीं था।
जैसे-तैसे उठा और फिर से अपने डॉक्‍टर दोस्‍त को फोन लगाया। उसने कहा कि बीपी का मामला लग रहा है। किसी डॉक्‍टर को दिखा लो या कहीं से बीपी चेक करवा लो। मैंने डॉक्‍टर की खोज शुरू की। कुछ समझ नहीं आया तो सीधे एक रिक्‍शा पकड़ा। रिक्‍श्‍ोवाले से कहा कि भाई किसी भी डॉक्‍टर के पास ले
चलो। इसके बाद रिक्‍शा पहले सड़क और फिर गलियों में चल रहा था। गलियां ऐसी सुनसान थीं कि डर लगने लगा था कि यहां कहीं मेरा सामान ही न छिन जाए।
क्रमश:

(*Parts of artwork have been borrowed from the internet, with due thanks to the owner of the photograph/art)

2015 की एक यात्रा- पार्ट 1

(आंख खुली तो मैंने खुद को कोच की फर्श पर पड़ा पाया)
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सुबह के 9 बज रहे थे। मैं ट्रेन के स्‍लीपर कोच की अपनी अपर बर्थ पर सोया था। गर्मी बढ़ने के चलते मेरी नींद खुली। नीचे झांकर देखा तो मिडिल बर्थ खुल चुकी थी और रिजर्वेशनधारकों के साथ दैनिक यात्री बैठकर बाते कर रहे थे। देर तक लेट-लेटे शरीर में हलका दर्द होने लगा था। मैं नीचे उतरा और जगह बनाकर बैठ गया। कुछ देर हवा खाने के बाद मैं वाशरूम के लिए गया। अपने कम्‍पार्टमेंट से कुछ ही दूर पहुंचा था कि कदम ठिठक गए। पहले आंखों के सामने हलका अंधेरा आया और फिर ब्‍लैक आउट हो गया। आंख खुली तो मैं कोच की फर्श पर पड़ा था। वहीं बैठे लोगों ने मुझे उठने में मदद की और अपनी सीट पर बैठा लिया। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर मेरा साथ हुआ क्‍या है।
कुछ देर बैठने के बाद मैं साधारण महसूस करने लगा। इसके बाद वाशरूम गया और फिर वापस आकर अपनी सीट पर बैठ गया। अपने साथ हुई घटना को मैंने सीट पर साथ में बैठे एक सज्‍ज्‍न से साझा किया। उन्‍होंने कहा कि तुम अभी खाली पेट हो, शायद इसी वजह से ऐसे हुआ हो। मुझे उनका लॉजिक समझ तो नहीं आया, लेकिन फिर भी मैं उनकी बात पर सहमत हो गया। ट्रेन जैसे ही बस्‍ती स्‍टेशन पर रुकी मैंने एक पानी की बोतल खरीद ली। बैग से बिस्‍किट निकाले और उन्‍हें खाकर पानी पी लिया। दिमाग में अभी भी यही चल रहा था कि आखिर मुझे चक्‍कर कैसे आ गया। इससे पहले मैंने कभी भी (गस) चक्‍कर का अनुभव नहीं किया था। वहीं मन को यह भी समझा रहा था कि अब कुछ खा लिया है, इसलिए सब ठीक हो जाएगा। ट्रेन वहां से चल चुकी थी। मुझे गोरखपुर में उतरना था। वहां से मुझे काठमांडु पहुंचने का इंतजाम करना था। दरअसल, कुछ दिनों पूर्व अचानक ही पशुपतिनाथ बाबा के दर्शन करने की इच्‍छा जागी थी। इसके बाद मैंने कुछ मित्रों से जाने को लेकर बात की, लेकिन कोई भी चलने को राजी नहीं हुआ। इस पर मैं अकेला ही सफर पर निकल आया था।
ट्रेन अच्‍छी गति से चल रही थी, इसी बीच मुझे फिर वाशरूम जाने के लिए उठना हुआ। वाशरूम गया और फिर ट्रेन के गेट पर खड़े होकर हवा खाने को मन हुआ। लेकिन मन में खयाल आया कि कहीं चक्‍कर न आ जाए। डर के चलते पीछे हटकर पार्टीशन से पीठ लगाकर खड़ा हो गया। वहां खड़े हुए कुछ ही देर हुई थी कि जिसका डर था वही हुआ। मैं फिर अचानक गस खाकर गिर पड़ा। आंख खुली तो लोग मुझे उठाने की कोशिश कर रहे थे।
मेरी समझ नहीं आ रहा था कि आखिर मेरे साथ क्‍या और क्‍यों हो रहा है?
क्रमश:

(*Parts of artwork have been borrowed from the internet, with due thanks to the owner of the photograph/art)

शनिवार, 8 अप्रैल 2017

Alwar : एक अजनबी शहर का दिल की धडक़न बन जाना



आज से ठीक एक साल पहले एक अजनबी शहर अलवर में कदम रखा था। मेरे पास सिर्फ कपड़ों से ठसाठस एक बैग, एक स्लीपिंग बैग और राजस्थान पत्रिका अखबार के कार्यालय का पता था। इस शहर के इतिहास या भूगोल की कोई जानकारी तो थी नहीं, हां यह जरूर सुना था कि मेव बहुल क्षेत्र है और आपराधिक घटनाएं यहां आम हैं। पहले दिन के कुछ घंटे तो रहने और खाने की कोई माकूल व्यवस्था न होते देख तनाव में ही बीते थे। लेकिन एक दिसंबर की ही शाम होते-होते इस शहर ने आखिर मुझे पनाह दे ही दी थी। इसके बाद वात्सल्य का जो निर्झर मेरे लिए इसके हृदय से फूटा, वो आज तक मुझे सराबोर किए है।
आज अरावली पर्वत श्रंखला की गोद में बसे इस खूबसूरत शहर में एक वर्ष का सफर पूरा होने पर मैं पीछे मुडक़र देख रहा हूं। कितना कुछ मिला है इस शहर से, इसी शहर में तो मैंने अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ एक वर्ष जिया है। जिसमें 365 दिनों को मैंने जीवन के विविध रंगों में घोलकर पिया। इसके आंगन में आशा के शिखर तक चढ़ा तो निराशा के पाताल तक गोता भी लगाया।
इसके गगन में मैंने ख्वाबों की परवाज भरी है। इसकी राहों पर ही मैंने मदमस्त बेफ़िक्रा होकर घूमना सीखा है। आज यह शहर मेरे दिल की धडक़न है। हर सांस इसकी खुशबू लेकर अंदर जा रही है।
शुक्रिया अलवर मुझे अपनाने का...
शुक्रिया मुझपर बेपनाह मोहब्बत लुटाने का...
शुक्रिया उन सभी हमसफरों का भी, जिन्होंने इस एक साल के सफर को सुहाना बनाने में साथ दिया।

अभी तक मलाई मक्खन नहीं खाया... तो जीवन व्यर्थ है तुम्हारा


भैया जो फ़ोटू डाली हैं, इसे कहते हैं मलाई मक्खन...। कुछ ऐसा आइटम जिसे स्वर्ग के किसी व्यंजन से जोड़कर देखा जा सकता है। माने कित्ता भी खा लो पर जी नहीं भरेगा। इतना जबर स्वाद है कि हम जैसे मिठाइया तो इसे देख के ही बौरा जाते हैं।
इसी मलाई मक्खन के चक्कर में बचपन में एक दफे अमूल बटर की टिकिया ख़रीद ली। और जब हपक के बड़ी सी बाइट काट ली तो थूकते-थूकते थक गए लेकिन साली मुंह में घुसी बटर की नमकाहट न गई। तब साला पहिली दफे समझ आया कि अंग्रेजी का ईजाद सिर्फ आदमी को चूतिया (बेवकूफ) बनाने के लिए किया गया है।
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आधी जिंदगी खप जाने के बाद समझ आया कि अपने जीवन का लक्ष्य तरह-तरह के व्यंजनों का स्वाद लेना और जितनी हो सके दुनिया नाप लेना ही है। हालांकि कि कुछ मर्सडीज-बीएमडब्लू क्लास के अलावा स्प्लेंडर क्लास तक के लोग हमें चूतिया मानते हैं। उनके ऐसा मानने में कोई बुराई है नहीं। हम लोग हैं ही चूतियामेटिक। क्योंकि अपने को ख़ुशी इस चूतियापे में ही मिलती है, तो का करें...।
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खैर बात मतलब की करते हैं। ऊपर जिस आइटम की बात की है उसका स्वाद जरूर लो। एक बार ले लिया तो यह समझ लो कि यह गुलजार वाले नमक के इश्क़ की तरह ही लगेगा, जो जिंदगी भर छूटेगा नहीं। आज घर आया हूँ और हरदोई में हूँ। सुबह उठकर नित्य कर्म से निवृत होने से भी पहले मलाई मक्खन खाने निकल लिया। इस बार खा कर ही नहीं आया इस आईटम का पोस्टमॉर्टम भी कर लिया।
हरदोई में यह बड़े चौराहे पर सियाराम की दुकान के सामने मिलता है। ठेल वाले हैं भैया श्यामजी। ठेल का नाम श्यामजी मलाई मक्खन वाले। वो हरदोई वालों को करीब 20 साल से मलाई मक्खन खिला रहे हैं। इससे पहले उनके पिताजी मन्नी लालजी बगल के जिले सीतापुर में मलाई मक्खन बेचते थे।
श्यामजी से पूछा कि आखिर आपके पिता जी ये आइटम कहां से ले आए?
इस पर उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई। बोले पिता जी अपने जवानी में घर छोड़कर लखनऊ भाग गए रहे। हुंआई पहिले किसी सेठ के घर रुके लेकिन मन नहीं लगा। फिर एक हलवाई के पास रहे। वही हलवाई उन्हें सिखाई दिएस।
फिर 20 साल तक वो सीतापुर में मलाई मक्खन बेचिन फिर हरदोई आ गए। हियां हम और पिता जी दोनौ जने ठेला लगावै लगे। पिछले कुछ साल से पिता जी तो बीमार रहई लगे तो अकेले हमही लगाई रहे हैं।
श्यामजी बताएन कि मलाई मक्खन बनारस में मलैया और आगरा में दौलत की चाट के नाम से मिलता है।
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तो गुरु हरदोई में मलाई मक्खन का पता तो हमने बता दिया। कुछ दिन पहिले शहाबाद वाली Komal Rastogi जी बताई रहन कि दिल्ली में चावड़ी बाजार में अपना आइटम अवेलेबल है। आगरा की दौलत चाट और बनारस की मलैया के अलावा जहां कहीं भी जिस नाम से यह मिलता है आप बताओ। बताओ ही नहीं खाकर आओ और पैक कराकर घर वालों को भी जायका दिलाओ। जिससे कि इन चीजों को बेचने वालों की रोजी-रोटी चलती रहे।
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..और फिर हम और आप जैसे चटोरे तो इन्हीं चीजों के चलते जिन्दा हैं। ये मिलना बंद हो गईं तो सल्फाज खाकर जीवन ही समाप्त करना पड़ जाएगा।

सोचता था कि खजूर मुसलमानी आइटम है और नॉनवेज भी


ये जो कटोरी में आप रबड़ी नुमा आइटम देख रहे हैं, यह दूध में पका खजूर है। मुझे ये काफी पसंद आया, हालांकि मुझे हर मीठी चीज पसंद आती ही है। खाते तो हम इसे बचपन से आ रहे हैं। लेकिन तब दूध में बाजार से सूखे मेवे के रूप में लाया गया छुहारा होता था। कुछ साल पहले ही जाना कि खजुरिया, खजूर और छुहारा सब एक ही बिरादरी के हैं। 
यहां एक बड़ी मजेदार बात साझा कर रहा हूं। अपने शहर हरदोई में बचपन में जब बाजार में ठेल पर खजूर बिकता देखता तो इससे घिन आती थी। वजह इसका उस क्षेत्र में बिकना जहां, कुछ ही दूरी पर मीट बिकता था। मैं इसके और मीट के लाल रंग को मिलाकर देखता और सोचता था कि यह भी मांसाहार वाला कोई आइटम है। क्योंकि जिस क्षेत्र में यह बिकता था वह मुस्लिम बहुल था, ऐसे में यह भी सोचता था कि यह कोई मुसलमानी आइटम है। जिससे हम हिन्दुओं का कोई लेना देना नहीं है। जबकि ये सब बातें किसी ने मुझे बताई नहीं थीं। यह सब दिमागी खर-पतवार ही था। लिहाजा सालों तक मैंने खजूर नहीं चखा।
कुछ समय पहले ही किसी ने मुझे खजूर खिलाया तो मैं इसके स्वाद से परिचित हुआ। मीठा था तो स्वाद भी जम गया। बीते शनिवार को आलू की टिक्की (भल्ला/चाट) खाने के लिए रुका। खाते-खाते बगल में ठेल पर बिकता दिख गया। एक आधा किलो का पैकेट ले लिया। अगले दिन ऑफिस गया तो एक साथी से ये बात साझा की कि भाई जिंदगी में पहली बार खजूर खरीदा है। उन्होंने मेरी तरफ घूर के देखा और दूध में डालकर इसको खाने के तमाम गुण गिना दिए। वो गुण तो अपन ने किनारे कर दिए लेकिन जायका सोचकर चहक उठा। अगले ही दिन आइटम तैयार कर लिया। आज लिखने भी आधा कटोरी चट करने के बाद बैठा हूं।
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भाई जोरदार आइटम है। अगर अब तक ट्राई न किया हो तो कर लो। वरना मरने के बाद ऊपर जवाब देते नहीं बनेगा।

...और फिर पूरे दिन उसकी चहचहाहट गूँजती रही

वह फुदकती हुई चिड़िया की तरह मेरे कमरे में आई. मुझे दो टॉफ़ी थमाई और जाने लगी. मैने पूछा, अरे बता तो दे आज है क्या... अपने आगे के टूटे दातों के बीच से साँस खीचकर बोली, मेरा हैपी बड्डे....मैने बड़ी मुश्किल से उसे रोका और शेक हैंड कर विश किया.... इतना खुश थी कि पलट कर थैंक यू की जगह मुझे भी हैप्पी बड्डे कहकर भाग गयी.
कुछ देर बाद उसके रोने और अपनी माँ से लड़ने की आवाज़ आ रही थी. कह रही थी भैया के बड्डे पर केक आई थी मेरे पर क्यों नहीं आएगी... माँ कोई जवाब नहीं दे रही थी... कुछ देर बाद उसकी माँ ने झल्लाते हुए कहा, चुप हो जा नहीं तो पीट दूँगी.
मैंने साइड से पूछ लिया. भाभी वो रो क्यों रही थी ? वो डबडबाई आँखों से बोलीं, भैया मम्मी (सास) (मेरी मकान मालकिन) को लड़कियों का जन्मदिन मनाना पसंद नहीं है.
मैं बाजार गया, चिड़िया के लिए एक कैडबरी सेलेब्रेशन लाया. लौट कर आया तो वह गली में क्रिकेट खेल रहे बच्चों के बीच कुछ उदास सी बैठी थी (शायद जवाब ढ़ूंढ रही होगी कि आख़िर मेरे लिए केक आया क्यूँ नहीं, आख़िर दादी को लड़कियों का केक काटना पसंद क्यों नहीं). मैने उसे गिफ्ट पैक थमा दिया. पलट वह कुछ नहीं बोली. मैं अपने कमरे में चला आया. अंदर उसकी आवाज़ आ रही थी. वह अपने भाई सहित एक-एक लड़के को इठलाते हुए गिफ्ट दिखा रही थी.
इसके बाद केक भूलकर पूरे दिन घर में उसकी चहचहाहट गूँजती रही.


(*Parts of artwork have been borrowed from the internet, with due thanks to the owner of the photograph/art)

भगत सिंह ने यह बताया था इन्कलाब का अर्थ...

"इन्कलाब जिंदाबाद से हमारा यह उद्देश्य नहीं था, जो आम तौर पर गलत अर्थ में समझा जाता है। बम और पिस्तौल इन्कलाब नहीं लाते। बल्कि इन्कलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है। हमारे इन्कलाब का अर्थ पूंजीवाद और पूंजीवादी मुद्दों की मुसीबतों का अंत करना है।"
उक्त व्याख्या शहीद-ए-आजम भगत सिंह ने असेम्बली बम धमाके की सुनवाई के दौरान दिया था। भगत सिंह की लड़ाई मनुष्य के शोषण के खिलाफ थी। इसका जिक्र बम धमाके के बाद असेम्बली में उड़ाए पर्चों में भी था।
उनमें लिखा था कि हम मनुष्य के जीवन को पवित्र समझते हैं। हम ऐसे उज्ज्वल भविष्य में विश्वास रखते हैं, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण शान्ति और स्वतंत्रता का अवसर मिल सके। हम मानव रक्त बहाने के लिए अपनी विवशता के लिए दुखी हैं पर क्रांति द्वारा सबको समान स्वतंत्रता देने और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को समाप्त कर देने के लिए क्रांति के अवसर पर कुछ न कुछ रक्तपात अनिवार्य है।
भगत सिंह की लड़ाई मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण के खिलाफ थी। लेकिन देश में आज़ाद सवेरा आने के बाद भी हम उस दिशा में कितना आगे बढ़ सके...?
हाँ, सकारात्मक बदलाव आए हैं। लेकिन शायद दाल में नमक से भी कम। इस दिशा में हमें बहुत कुछ करने की जरूरत है। देश की 80% आबादी अभी भी दो वक़्त की रोटी के लिए जूझ रही है। हमें उनके भी हक़ की बात करनी होगी। इसके लिए हमें खुद को शोषित से शोषक में तब्दील होने से भी रोकना होगा।
इन्कलाब का अर्थ समझे बिना... इन्कलाब जिंदाबाद का नारा बुलंद करना इन बलिदानियों का अपमान होगा।
भाई भगत, राजगुरु और सुखदेव को बलिदान दिवस पर सत-सत नमन।
दुआ है हम सब भी देश और देशवासियों के प्रति प्रेम के उस भाव को महसूस कर सकेंगे। जिसमें इन वीर जियालों ने हंसते-गाते फांसी के फंदे को चूम लिया था।