शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2016

क्या खाकी को सिर्फ गाली ही दोगे... तो फिर हेमंत, मुकुल और जिया को भी गाली दो... ----------------------- सोशल मीडिया आर्मी से जुड़ी पोस्ट से भरा पड़ा है। इसी बीच आज पुलिस स्मृति दिवस आ गया। लेकिन खाकी को लेकर चुप्पी है। और जब यह चुप्पी टूटेगी तो कुछ पोस्ट दिखेंगी, जिनमें कोई पुलिसकर्मी किसी महिला को पीट रहा होगा, बैठकर रिश्वत के पैसे गिन रहा होगा या ड्यूटी के दौरान सो रहा होगा। कितनी बुरी है हमारी पुलिस। लेकिन क्या सिर्फ बुरी ही है। आप हां भी कह सकते हैं, अगर सिक्के का सिर्फ एक पहलू ही देखें। दरअसल, हमने सिर्फ स्याह पहलू ही देखा या या यूँ कहें कि दिखाया गया। क्या कभी हमने ड्यूटी के लिए जान कुर्बान करने वाले मुम्बई में हेमंत करकरे, मथुरा में मुकुल द्विवेदी, कुण्डा में जिया उल हक़, मुरैना में नरेंद्र कुमार सिंह के बारे में सोचा है। क्या उनकी कुर्बानी शहादत नहीं है। पुलिस के जिस सिपाही की तस्वीर ड्यूटी पर सोते हुए छपी थी। क्या आपको बताया गया कि इस ड्यूटी से पहले कितनी रातों से सोया नहीं है। क्या आपने जाना कि कब से उसने अपने बच्चे का मुंह नहीं देखा। क्या आपको पता है उसके खाना खाने का कोई समय नहीं होता। आपको सात घंटे की ड्यूटी के बाद अगर एक घंटे अधिक ऑफिस में रुकना पड़ जाए तो न जाने कितने लेबर लॉज़ का आप हवाला देते हैं लेकिन उनके लिए ड्यूटी का कोई निर्धारित समय नहीं है। 24 घंटे ड्यूटी। इसके बाद जनता के प्रतिनिधि का रौब देखने की मजबूरी सो अलग। दिनभर सिर्फ़ अपराध, अपराध और अपराध के साए में जीना होता है। --- बुराइयां हैं। हर देश में। हर समाज में। हर विभाग में। आप में और मुझमें भी। लेकिन क्या हमें उससे ऊपर नज़र उठाने की जरूरत नहीं है। अगर आप चाहते हैं कि पुलिस अच्छी हो, उसका बर्ताव अच्छा हो तो आपको अपने बर्ताव में भी छोटी-छोटी तब्दीली लानी होंगी। इसके लिए शुरुआत धूप में ट्रैफिक कंट्रोल कर रहे सिपाही को अपनी बोतल से ठंडा पानी ऑफर करने से भी हो सकती है। सोचना होगा। गौर से देखना होगा।नहीं तो हम अनजाने में ही देश की माटी और हमारी व आपकी सुरक्षा में अपनी जिंदगी कुर्बान करने वाले सम्मान से वंचित रह जाएंगे। अंत में उन सभी खाकी के वीर सिपाहियों को नमन, जिन्होंने खाकी और देश का इक़बाल बुलंद रखा। ------------------------------- बता दें कि आज ही के दिन 21 अक्टूबर 1959 को लद्दाख सीमा पर चीनी सैनिकों के हमले में शहीद हुए सीआरपीएफ के दस जवानों की याद में हर साल पुलिस स्मृति दिवस मनाया जाता है। तब से 2015 तक करीब 34 हजार पुलिसकर्मी देश की आंतरिक सुरक्षा में शहीद हो चुके हैं।

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रविवार, 16 अक्टूबर 2016

ये नाकारा बच्चे हैं...

कल पेरेंट्स-टीचर्स मीटिंग में स्कूल जाना हुआ। उसी स्कूल में जहाँ से मैंने नवीं से बारहवीं तक की पढ़ाई की। और एक नाकारा स्टूडेंट के रूप में पासआउट हुआ। 
ये पहला मौका था इस तरह की मीटिंग में जाने का।गजब माहौल था। बच्चों के पिता तो कम माताएं ही अधिकतर आई थी। पिताओं के पास फीस चुकाने के अलावा किसी और भागीदारी का समय ही कहाँ लेकिन बेटा/बेटी अधिकारी से कम न बने। 
चलिए आगे के खुशनुमा नाजरे देखिये- माताओं के मीटिंग हॉल में घुसते ही महिला शिक्षकों का झुंड यह सिद्ध करने में जुटा है कि जिस बच्चे के साथ वो आई हैं वह दुनिया का सबसे नाकारा बच्चा है। वह सिर्फ अवगुणों से भरा है।
- उसका वर्क कभी पूरा नहीं रहता
- क्लास में कभी जवाब नहीं देता
- ऊटपटांग सवाल करता है
- उसकी शैतानियाँ बर्दास्त के बाहर हैं
- फ्रेंडशिप गंदे बच्चों से है
- बात करने का तरीका बहुत गंदा है...ब्ला...ब्ला...ब्ला।
इन सब उलाहनों के बीच बच्चों से टूटी फूटी अंगरेजी में बात। ताकि साथ आई माँ डर जाएं और मैडम से हिंदी में कोई सवाल न कर सकें। बात जी जी जी...तक रह जाए। अरे मैडम ये मीटिंग क्या सिर्फ उलाहना देने के लिए बुलाई थी। इस पर भी कुछ बात कर लेते कि बच्चे में अगर कोई कमजोरी है तो कैसे उसकी मदद की जाए।
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एक और नजारा- एक मैथ्स के शिक्षक, जिन्होंने मुझे भी पढ़ाया। प्रवचन दे रहे थे, मुझे 16 साल पढ़ाने का अनुभव है। मुझे क्लास के हर बच्चे का लेवल पता है। आपकी लड़की एवरेज है पर आगे जा सकती है अगर मेहनत करे। अरे क्लास के कुछ बच्चे तो बहुत टैलेंटेड हैं। उस लड़की का क्या नाम है...हाँ कम हाइट वाली। हां... बहनजी अगर वो लड़की न आए तो क्लास में पढ़ाने में मजा ही नहीं आता। क्या दिमाग है उसका। सवाल बोर्ड पे लिखा नहीं की फट से सॉल्व।

...अरे गुरु घंटाल...फिर तुम उसे क्या पढ़ा और सिखा रहे हो। वो तो खुद ही टैलेंटेड है। अगर ये एवरेज और वीक वाली ऐसा कर दिखाएँ तो सीना चौड़ा करो। इनको सिखाने में मजा क्यों नहीं लेते...मजा...!
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वैसे यह कहानी अधिकतर संस्थानों की है। सारा ध्यान उन बच्चों पर है जो तेज हैं न कि कमजोर को सपोर्ट करने में। कारण, बोर्ड एग्जाम मेरिट में सिर्फ वही इनका सिर ऊंचा करेंगे। एवरेज और कमजोर वाले तो नाकारा हैं...नाकारा।
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हालाँकि एक कोने में बैठा बुड्ढा इतिहास कुछ और ही कह रहा है... वो कहता है, जिन्हें इन सो कॉल्ड शिक्षकों ने नाकारा घोषित कर दिया। वो बच्चे सफलता के फलक पर तारा बनकर चमके हैं। उनके आविष्कारों ने दुनिया को राह दिखाई है।

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ऐसा है क्या...। मतलब वो E= mc2 वाला भी नाकारा था क्या। अच्छा तो वो हवाई जहाज वाले दोनों भाई। अरे वो जिसके सिर पर सेब गिरा था। और वो बल्ब वाला। अच्छा और भी बहुत सारे आविष्कार और खोज करने वाले ऐसे ही हैं।

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 नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता। स्कूल में तो हमें ऐसा नहीं बताया गया। सर और मैम तो कहते थे वो सब बहुत महान थे।



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किसी स्त्री का मर्जी से किसी के साथ सोना हैरान करता है गैंगरेप नहीं

गैंगरेप के बाद युवती की हत्या, मासूम के साथ उसके चाचा द्वारा बलात्कार कर उसकी हत्या। उक्त दोनों घटनाओं से जनपद या यूं कहें समाज या यूं कहें मनवता शर्मशार है। ऐसा अखबार और न्यूज चैनल बता रहे हैं। मगर शर्म महसूस हो रही है या नहीं यह कहना थोड़ा मुश्किल है। खैर न भी हो तो क्या फर्क पड़ता है। सिर्फ शर्म कौन सी क्रांति ले आएगी। 
वहीं एक फोटो अखबार में देखी, पूर्वी यूपी के किसी जिले में एक महिला को घर से बाहर बैलगाड़ी में उसके पति ने बांध कर रखा है और रोज पीटता है। मामला पति के प्रेम संबंधों के विरोध का बताया गया। इधर, इंडिया टुडे का पिछला अंक नेपाल की गुमशुदा बेटियों का दर्द बयां करने की कोशिश कर रहा है। जो लखनऊ से लेकर जीबी रोड के कोठा नंबर 64 तक में ठूंस दी गई हैं।
चारों घटनाओं को अलग-अलग नजरिये से देखा और लिखा गया। मगर कोई भी इन्हें पढ़ या देख कर कुछ पलों से ज्यादा के लिए हैरान नहीं हुआ है, यहां तक मैं भी नहीं। हो भी क्यों, ऐसा कौन सा दिन होता है जिस दिन ऐसी घटनाएं नहीं होतीं। मुझे तो लगता है कुछ समय बाद ये घटनाएं न्यूज भी नहीं बनेंगी। कारण, न्यूज की परिभाषा ही यही कहती है कि जो नया और लोगों के लिए मनोरंजक है वही न्यूज है।अब और नया होने को रह ही क्या गया है।
भाई, देखो बाप बेटी का सौदा तो सालों साल से करता आ रहा है। अब रेप भी करने लगा है। इसमें बुराई ही क्या है। जब बेटी कोठे पर बैठेगी तो साला सैंकड़ों लोग उसके शरीर को मसलेंगे अगर बाप घर में उसे मसल रहा है तो प्रताणना कम ही समझो। अब जब बाप ऐसा कर सकता है तो चाचा, पड़ोसी और गांव का कोई व्यक्ति ऐसा कर दे तो कोई बहुत बड़ा दोष थोड़ी ही है। भाई, स्त्री तो भोग के लिए ही बनी है। जमकर भोगो। और मौका मिले तो आगे बढ़कर सांत्वना भी देने से न चूको..." अरे ये तो बहुत बुरा हुआ बेचारी के साथ ".... लेकिन मौका पाते ही तुम भी वही करो जिसके लिए सांत्वना देने गए थे। अब कोई और सांत्वना देने का मौका लपक ही लेगा।
हां, एक परिस्थिति है जहां सारी परिभाषाएं, सारी मान्यताएं उलट जाती हैं। पूरा समाज सच में शर्मशार महसूस करता है। हर किसी के दिल में सांत्वना की जगह गुस्से के गुबार उठने लगते हैं। जब भोग के लिए बनी यह स्त्री अपनी मर्जी से किसी को अपना जिश्म सौंप दे या शादी के बंधन में बंधने के लिए मजबूर होकर भाग जए। यह तो पाप है महापाप। छी… सभी को घिन आने लगती है उससे, है ना। अरे भाग न भी गई हो महज मुस्कुरा कर किसी से बात भी कर ले तो समझिए सारी मर्यादाएं तार-तार हो गईं। मानों एक मछली ने सारा तलाब गंदा कर दिया हो। सभी बदबू से कराह उठते हैं। कमाल है भाई। धन्य है समाज। धन्य हैं मर्यादाएं। धन्य है समाजी। जिंदाबाद जिंदाबाद।
नोट- उक्त समस्या के कई अन्य महत्वपूर्ण पहलू भी हैं।



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मातृत्व के ये भी मायने...

महिलाओं को दिया गया मातृत्व का वरदान परिस्थितियों के साथ अभिषाप भी साबित होता है। हमारी समाजिक कुंठित कर देने वाली व्यवस्था में बच्चे को गर्भ में नौ महीने रखना, प्रसवपीड़ा को बर्दास्त करना और उसका पालन-पोषण करना महिला की मजबूरी है। इसमें पुरुष का योगदान अर्थिक सहयोग तक सीमित है और कहीं-कहीं तो वह भी नहीं। 
काश र्इश्वर कोर्इ ऐसी व्यवस्था बनाता जिसमें पुरुष के मंसूबे बुरे होने पर महिला गर्भवती ही न होती। या फिर बच्चा साढ़े चार-चार महीने दोनों के गर्भ में पलता। मैं र्इश्वर में विश्वास रखता हूं और उसकी बनार्इ हर व्यवस्था में भी लेकिन फिर भी कर्इ बार मुझे ऐसा महसूस होता है कि महिलाओंं के साथ न्याय नहीं हुआ। उसकी संरचना भावनात्मक रूप से तो पुष्प से भी ज्यादा कोमल कर दी गर्इ लेकिन सामना करने के लिए परिस्थितियां पत्थर से भी कठोर और कांटों से भी ज्यादा नुकीली दी गर्इं।
यह तो सिर्फ विवाहित महिलाओं की दुश्वारियां हैं। सोचिये, अविवाहित महिला के लिए मातृत्व के कितने भयावाह मायने हैं। हर एक कदम फूंक-फूंक कर रखने को विवश है। सामाजिक कीचड़ में उसका जरा सा पैर फिसला नहीं कि लांछनों के गर्म तेल के कढ़ाहे उस पर उड़ेल दिए जाते हैं। फिर पूरी जिंदगी उसे इन फफोलों के साथ ही जीनी नहीं काटनी होती है।

नोट- यहां महानगरों की उन नारियों को फिलहाल अपवाद ही माना जा सकता है, जो देर रात तक काल सेंटरों में नौकरी करने, ब्वायफ्रैंड के साथ घूमने-फिरने को आजाद हैं। अनवांटेड-72 जैसी पिल्स उनकी पहुंच में हैं। शादी के बाद बच्चा कब पैदा करना है, अगर दो पैदा करने हैं तो उनमें कितना गैप रखना है इस पर पति से बहस भी कर लेती हैं।
यहां तो बात उनकी हो रही है जिन्हें कालेज गांव से दो किलोमीटर दूर होने की वजह से ही पांचवीं के बाद पढ़ार्इ से त्यागपत्र देना पड़ जाता है। कोर्इ लड़का अगर उसके चक्कर काटने लगे तो घर में लड़की को ही पिटार्इ कर तालों में जकड़ दिया जाता है। शादी किससे होगी, इसके बाद बच्चे कितने पैदा करने हैं इसपर भी उनका कोई जोर नहीं होता।



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Sankisa...एक कदम बुद्धि की ओर.…

हाल ही में उत्तर प्रदेश के फर्रूखाबाद जिले में स्थित संकिसा जाना हुआ। यह स्थान बौद्ध धर्म से जुड़ा है। मान्यता है कि यहां तथागत यानी गौतम बुद्ध ने अपनी मौसी गौतमी को स्वर्ग से आकर उपदेश दिया था। मैं संकिसा बतौर जिज्ञासु गया लेकिन स्थल की हालत और कुछ ढोंगियों की उपस्थिति ने भीतर का पत्रकार जगा दिया। एक अच्छी स्टोरी लिखने के लिए पर्याप्त साक्ष्य भी एकत्रित हो गए। एक पत्रकार तो संतुष्ट होकर लौटने को तैयार था लेकिन एक जिज्ञासु हताश था। हालाँकि अब भी उसे उम्मीद थी कि गौतम किसी ऐसे के पास ले जायेंगे जो उसकी पिपासा को शांत कर सकेगा और कहेगा बुद्धम् शरणम् गच्छामि..बुद्ध की शरण में चलो। मैं संतुष्टि और असंतुष्टि के भाव के बीच झूल रहा था.…फिर लौटने का फैसला किया लेकिन कुछ ही दूर आने के बाद मन में आया कि मुझे एक बार फिर वापस जाना है। बाइक वापस मोड़ दी लेकिन इस बार उस स्थान पर रुकना नहीं हुआ जहां तथागत स्वर्ग से लौटकर आये थे। मैं उससे एक किलोमीटर और आगे चला गया। मैं कुछ विदेशी मंदिर और साधना स्थल पहले ही देख चुका था, इस बार एक भारतीय मंदिर के आगे रुका जिसे मैनपुरी के किसी भिक्षु ने बनवाया था। अंदर गया तो एक बुजुर्ग भिक्षु मिले उन्होंने मुस्कान के साथ स्वागत किया। पहली बार कुछ सकारात्मक अनुभूति हुई। इसके बाद उनसे कुछ जानने-समझने बैठ गया। लेकिन कुछ देर बुद्ध के सिद्धांत बताने के बाद वो हिन्दू मान्यताओं और पाखंडों पर चोट करने लगे, इसी बीच दो अन्य भिक्षुओं का भी आगमन हुआ। वे दोनों देखने में विदेशी लगे (हालाँकि वो हमारे त्रिपुरा राज्य के थे)। कुछ देर बुजुर्ग भिक्षु को सुनने के बाद एक भिक्षु ने हस्तक्षेप किया। उसने हिन्दू धर्म की कुछ मान्यताओं का बेवजह खंडन करने पर बुजुर्ग भिक्षु को आड़े हाथ लिया। इसके बाद जो कुछ भी उसने कहा मैं डूबकर सुनता रहा। मुझे लगा गौतम ने आखिर मुझे एक सच्चे बौद्ध भिक्षु से मिला दिया है। इसके बाद उस युवा भिक्षु के साथ चर्चा शुरू हो गई । एक जिज्ञासु का चेहरा संतोष के भाव से खिलता जा रहा था। बौद्ध धर्म से लेकर दर्शन, देश-दुनिया के कई मुद्दों पर हमने खुलकर बात की। उसके पास से उठने का मन तो नहीं था लेकिन समय के अभाव ने विवश कर दिया।
बतौर जिज्ञासु मेरे पास लिखने को बहुत कुछ है। बतौर पत्रकार लिखने को बहुत कुछ है। लेकिन अब बहुत कुछ लिखने का मन नहीं कर रहा। अंत में ही सही गौतम इस जिज्ञासु को ज्ञान के एक ऐसे झरने के पास ले गए थे जो इसकी पिपासा को शांत कर सकता था लेकिन उसने शांत करने की जगह पिपासा और बढ़ा दी। उसने अंत में यह भी कहा कि बुद्धम् शरणम् गच्छामि...लेकिन अर्थ बदल चुका था उसने बुद्ध की शरण में नहीं बुद्धि की शरण में जाने को कहा। सच भी यही है, बुद्ध अपनी शरण में आने को कैसे कह सकते हैं, जब वो खुद किसी की शरण में नहीं गए।

Gandhi and Godse

I am prepared to concede that Gandhiji undergo suffering for the shake of nation. I shall bow in respect to the service and to him. But even this servant of the country had no right to vivisect the country by deceiving the people.
-Nathuram Godse

इन दिनों व्हाइ आइ एसेसिनेटेड गांधी पुस्तक पढ़ रहा हूं। इसमें नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या की एक नहीं पूरी 150 वजह बताई हैं। पुस्तक को पढ़कर लगता है कि नाथूराम कोई सड़क छाप या सिरफिरा आदमी तो एकदम नहीं था। वह खुद को राष्ट्र भक्त समझता था, लेकिन हिंदू राष्ट्र भक्त। एक व्यक्ति के रूप में वह गांधीजी का बहुत सम्मान भी करता था। यही वजह है कि पूरी पुस्तक में हर जगह संबोधन गांधीजी कहकर ही किया गया है।
यहाँ सवाल ज़रूर उठता है कि एक सुलझे और समझदार आदमी के अंदर अमानवीय बीज कैसे बो दिए गये।... तो इसके मूल में भी तथाकथित धर्म ही मिलता है. इन तथाकथित धर्मों ने धर्म और अधर्म की ऐसी जटिल और व्यर्थ परिभाषाएँ गढ़ी कि मनुष्य इसे समझने के फेर में अपना मूल धर्म खो बैठा।
इसी की बानगी हिंदुओं का सर्वश्रेष्ठ धार्मिक साहित्य महाभारत है। इसमें धर्म और अधर्म का युद्ध भी मानवता की लाश पर ही हुआ था। अगर गांधी जी जैसा अहिंसा का पुजारी महाभारत का कोई पात्र होता तो वहां भी उस पात्र का अंत ऐसा ही होता, जैसा बिरला हाउस में हुआ। गांधीजी जैसा पात्र किसी बड़े धर्म में आप फिट नहीं बैठा सकते। कहीं जीजस तो कहीं पैगंबर का अंत करने के लिए बढ़ने वाले पहले गांधीजी का अंत करेंगे। यही नहीं कुछ पैगंबर की रक्षा के नाम पर भी गाँधी का सिर कलम कर देंगें।
गोडसे ने जो किया कहीं न कहीं यह विष हमारे धर्म ग्रंथों से ही निकलकर बाहर आया है। जबकि इन ग्रंथों को लिखने वालों ने तो कोशिश मीठा शहद बाँटने की की थी लेकिन इसकी व्याख्या करने वालों ने इसमें मतलब का चूना भी मिला दिया। और लोगों को धार्मिक विष हाथ लगा। गांधीजी के दौर में किसी को महावीर या बुद्ध के रूप में स्वीकार किया जाना संभव नहीं था। नहीं तो गांधी भी आज एक धर्म के रूप में जाने जाते।
अब देखिए बात गांधीजी की हत्या से शुरू की थी और पहुंच धर्म पर गई। दरअसल उनकी हत्या के मूल में तथाकथित धर्म ही तो है। पाकिस्तान बनने के पीछे तथाकथित धर्म है, इसके बाद गोडसे द्वारा उठाए गए कदम के पीछे तथाकथित धर्म है। और अफसोस इस बात का ही है कि हमने अब भी मूल धर्म को समझा नहीं। गौतम और महावीर ने अपना जीवन खपा दिया सिर्फ धर्म को समझाने में। लेकिन लोगों ने धर्म तो समझा नहीं दो नये धर्म ही बना डाले।
खैर धर्म अनंत धर्म कथा अनंता...
बापू की पुण्यतिथि पर उन्हें सादर नमन। बापू अफ़सोस आपको आज तक समझा ही नहीं गया। काश आप भी मनवता का अर्थ समझाने की जगह लोगों को एक नए धर्म की अफीम देकर गए होते। सच कहता हूँ असाराम के दौर में लाखों लोग धार्मिक नशे में धुत होकर झूम रहे होते।...
हालाँकि कुछ गाँधी भवनों में आज भी नित्य श्रद्धा की बाती प्रज्ज्वलित की जा रही है। उनका प्रिय भजन रघुपति राघव राजा राम गूँज रहा है....लव यू बापू।



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अगर उम्मीद से दुनिया कायम है तो, इसका थोपा जाना 'दुनिया' का अंत भी है...

कभी-कभी हमारे इर्द-गिर्द ऐसा भी घटता है जिसे लिखे बिना रहा नहीं जाता. लिखने के पीछे का उद्देश्या कोई संदेश देना नहीं, बस घटना से अंदर पनपे आक्रोश से फटते माथे को ठंडा कर देने की कोशिश मात्र होती है. आज फिर कुछ ऐसा ही घटा है, जो आँखों को गीला और रूह को झुलसा गया है. 
खबर उत्तर प्रदेश की राजधानी से, यहाँ जिंदगी मौत से हारी है. एक छात्र ने बड़ी माँ की साड़ीको फंदा बनाकर, खुद को दुनियाँ में लाए जाने के फ़ैसले को ग़लत साबित कर दिया है. हालाँकि उस मासूम ने इसके लिए ज़िम्मेदार कॉलेज के एचओडी को ठहराया है...और उम्मीदों को पूरा न कर पाने के लिए पिता से माफ़ी मांगी....
आप का अपना नज़रिया होगा...होना भी चाहिए...
लेकिन मुझे नहीं लगता किसी की प्रताड़ना शक्ति के उस पुंज को आत्माहत्या के लिए विवश कर सकती है. प्रताडित करने वाले से लड़ने में वह सक्षम होगा, लेकिन लड़ इस लिए नहीं पाया क्योंकि उसके कंधों पर उम्मीदों का बोझ था. उसे डर लड़ाई हारने का नहीं, इन उम्मीदों के बिखर जाने का था. ये उम्मीदें, उसने खुद कंधों पर नहीं उठाईं थी, आप ने उसके कंधों पर लाद कर घर से भेजा था उसे. जब भी वह कॉलेज के दबाव से मन हल्का करने के लिए घर आता, आप उम्मीदों का बोझ थोड़ा और बढ़ा देते.
अब आप इसे मेरी कोरी कल्पना करार देने की कोशिश ना करिएगा क्योंकि इन उम्मीदों को ढोने की कोशिश मैं कर चुका हूँ. अपने दोस्तों, भाइयों और जिंदगी में टकराए न जाने कितने लोगों को झुके कंधों से इन उम्मीदों को ढोते देखा है मैने.
लेकिन मैं जानना चाहता हूँ आप सब ऐसा क्यों करते हैं. क्या पौधे कि मजबूरी है कि अगर आपने समय से उसे खाद और पानी दिया है तो वह आप को पुष्प और फल दे ही. क्या आप उसे आज़ाद नहीं छोड़ सकते जैसे जंगलों में उगने वाले पेड़ और पौधे आज़ाद होते हैं. उन्हें भी तो कोई खाद और पानी देता ही है ना. आप सब क्यों घर का सूनापन दूर करने, परिवार की ज़रूरत, सामाजिकता, बुढ़ापे की लाठी बनाने के लिए एक जीवन का सृजन कर बैठते हैं. क्या इस सृजन को भी आप फैक्टरी में तैयार उत्पाद के रूप में ही देखते हैं, जो आप की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए बनाया गया है.
मुझे पता है, आप उसे बेइंतेहा प्यार करते हैं, उसपर अपनी जिंदगी न्योछावर करने को तैयार हैं. उसकी आँखों से निकले एक आँसू के लिए आप दुनिया से लड़ जाने को तैयार हैं. फिर क्यों आप अपनी उम्मीदों को उसके गले का फंदा बनते नहीं देख पाते.
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अगर आप बिना किसी उम्मीद के ही पौधे को खाद और पानी देने में खुशी ढूढ़ लें तो इसी पौधे का पुष्प आपको आनंदित कर देगा, उसकी खुशबू आप के रोम रोम को खिला देगी (और फिर गीता में कृष्ण भी तो यही कहते हैं... मेरी नहीं तो उन्ही की मान लीजिए).
परमपिता की बगिया में अनंत प्रकार के फूल हर सुबह खिलते हैं. कोई अपनी खुशबू तो कोई सौंदर्य से अपनी पहचान बनाता है. आप इन फूलों को स्वच्छन्द भाव से खिलने दो. इनका मुकाम सिर्फ़ आपकी बालकनी नहीं पूरी दुनिया को महकाना है. आप तो माली की भूमिका को स्वीकार करो. और ईश्वर द्वारे बनाए इस रंगमंच में अपने किरदार को खुलकर जी लो...यही जीवन है...
इसी में सारा आनंद...परमानंद... स्वर्ग...जन्नत...मोक्ष सब छिपा है...



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