शनिवार, 15 अक्टूबर 2016

Munawwar Rana-last

पाकिस्तान का वो बुजुर्ग भारत आया तो उस खंबे से लिपटकर खूब रोया
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(आँखों देखा मुनव्वर-अंतिम)
अब समय मुनव्वर साहब को कुरेदने का था। मैंने पूछा कि आपको दो साल पहले उत्तर प्रदेश की उर्दू अकादमी का अध्यक्ष बनाया गया लेकिन कुछ समय बाद आपने इस्तीफा दे दिया। क्या वो ताज कांटों भरा था ?
मुनव्वर साहब थोड़ा ठहर कर बोले, आज गधों के रेट, घोड़ों से ज्यादा हो गए हैं। यही राजनीति है। सिस्टम की और बाते साझा करने के बाद वे बोले, दरअसल यूपी सरकार ने रिवाल्वर तो हमें दे दिया था। लेकिन कारतूस आजम खान अपने पास रखते थे। फिर क्या हमने भी रिवाल्वर फेंक दी और चले आए।
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बातों ही बातों में उनके गजल संकलन मुहाजिरनामा का जिक्र हुआ तो पाकिस्तान की बाते शुरू हो गईं। उन्होंने बताया 1990 में वे पहली बार पाकिस्तान गए। वहां उन्हें एक मुशायरे में शिरकत करनी थी। उन्हें यह देखकर हैरानी हुई कि जैसा भारत है, वैसा ही पाकिस्तान भी है। वही संस्कृति, वैसे ही लोग, वही अच्छी-बुरी आदतें, यहां तक की वहां के लोग भी वही गालियां देते हैं, जो हमारे यहां दी जाती हैं। लेकिन यहां से गए लोग आज भी वहां मुहाजिर (शराणार्थी) की तरह जी रहें हैं। उनकी रूह आज भी भारत में अटकी है। जैसे ही भारत के लोग पहुंचते हैं, वहां लोग घेर लेते हैं और रात-रात भर यहां की बातें सुनकर रोते हैं। सवाल भी कैसे- वो फला गांव में मोड़ वाला पीपल का पेड़ है या गिर गया, वो फला गुरुजी थे, उनके बच्चे अब क्या करते हैं, वो फला हलवाई अब भी वहीं दुकान लगाता है... ? वहां के बुजुर्ग अपने पोतों को भारत की कहानी किसी परियों वाले देश की तरह सुनाते हैं। दरअसल यहां से लोगों को वहां लालच देकर ले जाया गया था। 
इसके बाद गुजारिश पर मुहाजिरनामा के कुछ शेर... 
मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं,
तुम्हारे पास जितना है, हम उतना छोड़ आए हैं।
ये दो कमरे का घर और गुजरती जिंदगी अपनी,
वहां इतना बड़ा नौकर का कमरा छोड़ आए हैं।
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बुजुर्ग भारत आया तो उस खंबे से लिपटकर रोया
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भारत से पाकिस्तान चले गए एक बुजुर्ग कुछ साल पहले यूपी के बुलंदशर के अपने पुराने गांव आए। यहां उनकी पुस्तैनी हवेली थी, जिसे जाते समय उनके परिवार ने किसी जाट को बेच दिया था। जाट परिवार से इजाजत लेकर उन्होंने पूरी हवेली घूमी। इसके बाद बाहर लगे एक खंबे को देखा तो ठहर गए। इसके बाद वे उस खंबे से लिपटकर खूब राए। लोग हैरान। लोगों ने पूछा तो उन्होंने बताया कि यह खंबा उनके बचपन का साथी है। जब वे छोटे थे और घर में उन्हें कोई डांट देता तो वे इसी से लिपटकर रोते थे। वहीं खुशी में भी वे इससे लिपटकर गोल-गोल घूमते। इसके बाद उन्होंने जाट परिवार से गुजारिश की कि वे उनसे कुछ पैसे ले लें और जर्जर होती हवेली की मरम्मत करा दें। जाट परिवार के मान जाने पर उन्होंने कुछ लाख रुपए दे दिए। इसके बाद जब वे चलने लगे तो उन्होंने एक गुजारशि और की। इस जर्जर हवेली की एक लखौरी ईंट अपने साथ ले जाने की। जिसे परिवार ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। इस ईंट को वे अपने साथ पाकिस्तान ले गए। क्योंकि वहां वे बिलिनियर थे तो उनका घर भी आलीशान था। यहां उन्होंने दुनिया भर से लाए गए साजो-सामान के सजे ट्राईंग रूम में बीच दीवार पर इस ईंट को लगा दिया। जब उनके बच्चों ने उन्हें इसके लिए टोका तो उन्होंने दो टूक कह दिया कि अगर इस ईंट को निकाला गया तो वे भी घर से निकल जाएंगे। इसके बाद जब उनका अंत समय आया तो उन्होंने अपनी अंतिम इच्छा बताई। कहा- इस ईंट को मेरे दफनाने पर मेरे साथ रख देना। मुझे लगेगा कि मैं हिन्दुस्तान में सो रहा हूं।
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और जब मुशायरे के बाद अशोक चक्रधर फूट-फूटकर रोए
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पाकिस्तान के एक बड़े मुशायरे में शिरकत करने के लिए मुनव्वर साहब, वासीम बरेलवी साहब के साथ अशोक चक्रधर गए थे। यहां शानदार आयोजन हुआ। इन्हें लोगों की बेपनाह मुहब्बत मिली। इसके बाद रात में जब होटल में अशोक चक्रधर मुनव्वर राना के साथ बैठे तो अशोक चक्रधर फूट-फूटकर रोने लगे। वे बोले मुनव्वर भाई बचपन से यही तसव्वुर था कि पड़ोस में दुश्मन पल रहा है। लेकिन यहां सारे अपने ही हैं। इतनी मोहब्बत तो अपने देश में लोगों से नहीं मिली।
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इसके बाद मौजूदा माहौल को देखते हुए पाक से रिश्तों और हालातों को लेकर सवाल किए। इस पर मुनव्वर साहब ने यह कहते हुए कुछ सुझाव दिए कि जंग तो हल नहीं है। आज का युवा तपाक से कह देता है कि हमला कर दो। दरअसल उन्होंने जंग सिर्फ टीवी पर फिल्मों में देखी है। मैंने जंग की विभीषिका को बहुत नजदीक से देखा है। यह मंजर बहुत बयावाह होता है।
फिर कहते हैं कि आतंकवाद मजबूरी और गरीबी का नाम है। वो पाकिस्तान आतंकवाद के कैंसर को क्या दूर करेगा, जो अपनी दम पर एक कैंसर का अस्पताल न बनवा सका। इसके लिए इमरान खान पूरी दुनियां में घूमें और चंदा इकट्ठा कर बनवाया। 
इसके बाद वे कहते हैं कि 
कोई शरहद न होती, कोई गलियारा न होता,
मां बीच में होती तो बंटवारा न होता। 
दोनों देशों के बंटवारों के दौरान अगर नेहरू और जिन्ना की मांए साथ बैंठ जाती तो वे इस बंटवारे को होने नहीं देतीं।
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और जाते जाते उन्होंने अर्ज किया...
बुलंदियों का बड़े से बड़ा निशान छुआ,
जब मां ने गोद में उठाया तब आसमान छुआ।
मेरी ख्वाहिश है कि फिर से मैं फरिश्ता हो जाऊं
मां से इस तरत लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊं।


(*Parts of artwork have been borrowed from the internet, with due thanks to the owner of the photograph/art)

Munawwar Rana-3

जिन्होंने अम्मा का दूध पिया है, वे आम चूसकर खाते हैं...
(आंखों देखा मुनव्वर-3)
ड्यूड और बेब टाइप लडक़े-लड़कियों को कविता के करीब लाने का श्रेय काफी हद तक कुमार विश्वास को ही जाता है। लेकिन असल कवि सम्मेलन और मुशायरों की संजीदगी कुमार के अंदाज और अल्फाज से इतर है। वहां कुछ इतना गहरा और गाढ़ा है जो किताबी ज्ञान से परे है। वहां सिर्फ मनोरंजन नहीं शब्द साधक तजुर्बे की बारिश से अज्ञानता के बंजर को खत्म करने का काम करते हैं। जिससे मनो-मस्तिष्क में वैचारिक अंकुर फूटते हैं, चेतना जागती है। इसीलिए वहां का अपना अनुशासन भी है।
खैर राना साहब की ओर लौटते हैं। मैं ऑफिस पहुंचा तो तैयारियां पूरी हो चुकी थीं। मैंने क्वैश्चनयर का प्रिंट लिया ही था कि पता चला राना साहब पहुंच चुके हैं। मैं भागकर उनकी गाड़ी के पास पहुंचा (अगर उनकी जगह फिल्म जगत की कोई सेलेब्रिटी होती तो शायद ऐसा कभी न करता, हां अमिताभजी जैसे सीनियर कलाकरों की बात और है)। वे काले लिबास में हैं। घुटनों की तकलीफ के चलते बेंत का सहारा लेकर चल रहे हैं। सच कहूं तो 64 की उम्र में उनका शरीर 74 जितना कमजोर दिख रहा है। लेकिन उनकी बड़ी-बड़ी आंखों में बच्चों की आंखों सा निश्चलता का तेज झलक रहा है।
इस दौरान जैसे ही बॉस ने राना साहब को मेरा परिचय दिया, मैं वापस उस अवस्था में पहुंच गया, जिसमें मैं उनका बहुत बड़ा प्रशंसक और शिष्य हूं। इसी दौरान शायद नाम के आगे मिश्रा लगे होने से उन्होंने पूछा कहा से हैं आप ? मैंने कहा- जी हरदोई से। अब मैं भूल चुका था कि मुझे उनसे कुछ सवाल भी करने हैं। मैं उनके शागिर्द की तरह उनके साथ चल रहा था और सोच रहा था कि यह रास्ता खत्म न हो और मुझे उनकी यह नजदीकी हमेशा के लिए मिल जाए। इसके बाद ऑफिस की दो सीढिय़ों को चढक़र अंदर प्रवेश करना था। मुझे मालूम था कि उनके लिए यह थोड़ा कठिन है। इसी बीच उन्होंने सहारे के लिए मेरा हाथ मांग ही लिया और सीढिय़ा चढक़र अंदर पहुंच गए। यहां हमारे कुछ और सहकर्मी मौजूद हैं। इसके बाद शुरू हो गया सवालों का सिलसिला। कुछ रोचक व गंभीर अंश आप भी जी लें...।
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तब लगा कि मूल से ज्यादा सूद प्यारा होने का मुहावरा गलत है...
एक सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि जब वे सात साल के थे, तब उनके चाचा-बुआ के साथ उनके दादा-दादी भी पाकिस्तान चले गए। दादी उन्हें बहुत प्यार करती थीं। फिर भी वे चली गईं। इससे वे बहुत दुखी हुए। उस समय उन्हें लगा कि मूल से ज्यादा सूद प्यारा होने का मुहावरा गलत है।
(हालांकि आज भी हम महसूस कर सकते हैं कि हमारे प्रति दादा-दादी का प्रेम अनूठा है। वे पापा से ज्यादा हमें प्यार करते हैं। इसी को लेकर यह मुहावरा है कि लोगों को मूल धन से ज्यादा उससे मिलने वाला सूद यानी कि ब्याज प्यारा होता है)
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जिन्होंने अम्मा का पिया है वो आम चूस के खाते हैं...
दो साल पहले लखनऊ में आम की दावत थी। मुनव्वर साहब भी वहां गए थे। इस दौरान सवाल उठा कि भाई कुछ लोग आम चूसकर खाते हैं, कुछ लोग आम काटकर खाते हैं। ऐसा क्यों ? इस पर एक सज्जन ने जवाब दिया कि जो लोग पढ़े लिखे होते हैं, वे आम काटकर खाते हैं। वहीं जो अनपढ़ गंवार हैं, वे आम चूसकर खाते हैं। इस पर मुनव्वर साहब ने टोका और कहा कि ऐसा नहीं है। जिन लोगों ने अम्मा का दूध पिया है, वे आम चूसकर खाते हैं। वहीं जिन्होंने डब्बे वाला दूध पिया है, वे आम काटकर खाते हैं। (इस पर ऑफिस में ठहाके गूंज उठे)
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क्रमश:
पिस्तौल हमको दे दी, कारतूस आजम अपने पास रखते थे...



(*Parts of artwork have been borrowed from the internet, with due thanks to the owner of the photograph/art)

Munawwar Rana-2

मैं ठान चुका था कि कल ऑफिस नहीं आउंगा... लेकिन तभी बॉस बोले- कल मुनव्वर आ रहे हैं
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(आंखों देखा मुनव्वर-2)
समय के साथ मल्टीटास्किंग का दौर शुरू हुआ। इसने सबसे अधिक नुकसान पत्रकारिता जगत को पहुंचाया। संपादक से लेकर उपसंपादक तक सभी को क्लर्क और मैनेजर बनाकर रख दिया। सैलरी के नाम पर तो चंद रुपए की वृद्धि हुई लेकिन बड़े स्तर पर स्टाफ की कटौती की गई और काम का अत्याधिक बोझ कर्मचारियों पर डाल दिया गया। आज हिंदी अखबारों के अंदर स्थिति यह है कि एक उपसंपादक पांच लोगों (कॉपी एडीटर+प्रूफ रीडर+पेज डिजाइनिंग+रिपोर्टिंग+फोटोग्राफी) तक के कार्य को अकेला कर रहा है। वहीं संपादक जो प्रकाशित हर न्यूज कन्टेंट के लिए कानूनी तौर पर जिम्मेदार है, उसे समाचार पर नजर रखने के अलावा मैनेजमेंट की सभी जिम्मेदारियां सौंप दी गई हैं। ऐसे में अखबार में प्रकाशित न्यूज कन्टेंट की गुणवत्ता बनाए रखना कितना चुनौतीपूर्ण है, यह आसानी से समझा जा सकता है। आए दिन अखबारों में जो पाई, मात्राओं की त्रुटियां आपको दिखाई देती हैं, वह इसी का ही एक परिणाम हैं।
खैर छोडिय़े मुझे तो आपको मुनव्वर से रूबरू कराना है। ऑफिस में शुक्रवार का दिन था। अन्य दिनों की अपेक्षा कार्य की अधिकता थी। मेरी कोहनी में दर्द हो रहा था। लेकिन मैं किसी प्रकार काम को खींचे जा रहा था। मन में था कि अगले दिन यानी कि शनिवार को अपना साप्ताहिक अवकाश है। आराम कर लूंगा तो अपने आप दर्द में राहत मिल जाएगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं और शनिवार को भी मुझे ऑफिस आना पड़ा। हाथ में क्रेक बैंडेज बांधकर मैं काम में लगा हुआ था। अंदर से दुखी था और मन ही मन यह तय हो गया था कि कल किसी कीमत पर ऑफिस नहीं आउंगा। हेल्थ इज वेल्थ। शरीर के प्रति इमानदार होना बहुत जरूरी है, क्योंकि इसने साथ छोड़ा तो बिस्तर से उठना भी भारी हो जाएगा। वहीं दुखी यह सोचकर हो रहा था कि घर से दूर होने का यही सबसे पीड़ादायक पहलू होता है कि आपके आंखों में दर्द की झलक किसी को नहीं दिखती। मां पास हो तो न जाने कितनी बार पूछती है कि दर्द ज्यादा तो नहीं हो रहा। यह लगा दूं, वह लगा दूं, गर्म पानी से सेक दूं और न जाने क्या-क्या जतन। इन सबके के बीच कीबोर्ड पर अंगुलियां दौड़े जा रही थीं। इसी बीच मैंने रोषपूर्ण लहजे में अपने सहकर्मी को बोल दिया कि भाई मैं कल नहीं आउंगा। उसने कहा ठीक है।
यही कोई नौ के आसपास का समय हुआ होगा। बॉस आए और बोले कि तैयारी कर लो कल मुनव्वर राना आ रहे हैं। मैंने पूछा ऑफिस? वो बोले हां ऑफिस। अब दर्द भरा चेहरा खिलने लगा था। जिससे मैं कह चुका था कि कल नहीं आउंगा, वे मेरी ओर देखने लगे। मैंने उन्हें कहा अब तो आना पड़ेगा। वह चकित थे। अब मैं उन्हें क्या बताता मेरे लिए मुनव्वर से मुखातिब होने के क्या मायने हैं। 
मुनव्वर और शायरी से नजदीकियों में आगरा के उन यारों की सोहबत का भी असर है जो आए दिन मुशायरे के वीडियो डाउनलोड कर दिखाते और सूर सदन में आयोजित राष्ट्रीय स्तर के मुशायरों में साथ जाते थे। वे भी यादगार दिन हैं। हम अमर उजाला में थे, रात कोई 12 बजे काम से फ्री होते थे। इसके बाद सीधे बाइक सूरसदन की ओर दौड़ा देते और अपने शबाब पर पहुंचे कवि सम्मेलनों और मुशायरों के आनंद में डूब जाते। हम अंत तक रुकते और ऑडीटोरियम को वाह, वाह से गुंजायमान रखते। 
इधर, ऑफिस में काम के दौरान जहन में सवाल उठने लगे। मुनव्वर साहब से क्या-क्या पूछना है। उनके बारे में क्या जानना है। इसी ऊहा-पोह के बीच ऑफिस से काम खत्म कर घर आ गया। लैपटॉप पर इंटरनेट कनेक्ट कर उनके बारे में पढऩा शुरू किया। हालांकि उनके बारे में बहुत कुछ तो पहले से ही पता था। सवाल भी घिसे-पिटे हो गए थे। अभी तक जो सवाल मैंने सोचे थे, अधिकतर पूछे जा चुके थे। फिर भी एक क्वैश्चनयर तैयार कर लिया। जिसमें तत्कालिक मुद्दों के साथ ही न चाहकर भी उनको कुरेदने वाले कुछ सवाल शामिल थे। इसकी एक कॉपी बॉस को मेल कर दी। मुनव्वर साहब को रविवार को शाम साढ़े चार बजे ऑफिस आना है। मैंने दोपहर 12 बजे से ही घड़ी की ओर देखना शुरू कर दिया। अंदर से कच्चापन है लेकिन मेरी बढ़ी दाढ़ी सामने वाले को भ्रमित कर सकती है कि अपन पुराने टाइप वाले संजीदा पत्रकार हैं। हालांकि आत्मविश्वास में कोई कमी नहीं है क्योंकि तैयारी में कोई कसर नहीं छोड़ी है। और चार बजते ही बाइक उठाई और ऑफिस के लिए निकल पड़ा।
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यकीनन कुछ न कुछ तो खूबियां होंगी,
वरना यह दुनिया यूंही इस पागल की दीवानी नहीं होगी।
- मुनव्वर राना
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क्रमश: 
मैं उनके साथ ऐसे चल रहा था, जैसे उनका शागिर्द हूं।


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Munawwar Rana-1

‘... मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में मां आई’... क्या मुनव्वर राना को जानते हैं आप ?
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(आखों देखा मुनव्वर-1)
जरूरी नहीं की हर शख्स को जाना जाए। लेकिन कुछ लोगों को जानना उस समय जरूरी हो जाता है, जब वे आपकी जरूरत बन गए हों। दरअलस, मैं 2007 में जब घर और मां से दूर हुआ तो मुनव्वर साहब मेरी जरूरत बन गए। अपनी मां और माटी के प्रति उनकी बेइंतहा मोहब्बत ने ही मुझे उनके करीब लाकर खड़ा किया। फिर उनको जितना सुनता और पढ़ता गया उनके और करीब आता गया। 
बता दूं कि सैयद मुनव्वर अली उर्फ मुनव्वर राना का जन्म 26 नवम्बर 1952 में यूपी के सई नदी के किनारे बसे रायबरेली में हुआ। बंटवारे के कुछ साल बाद उनका 90 फीसदी परिवार पाकिस्तान चला गया। जिसमें मुनव्वर के दादा-दादी भी शामिल थे, जो मुनव्वर को बहुत प्यार करते थे। इसके बाद मुनव्वर के पिता कलकत्ता आ गए और ट्रांसपोर्ट का काम करने लगे। मुनव्वर की परवरिश कलकत्ता में हुई। यहां उन्होंने बीकॉम तक की पढ़ाई की और पिता के ट्रांसपोर्ट के काम में हाथ बंटाया। यहीं इन्होंने शायरी लिखना शुरू कर दिया। लेकिन कलकत्ता की संस्कृति में शेयरों-शायरी को निम्न माना जाता था। वहीं एक बार लखनऊ में मुनव्वर अपने उस्ताद वाली आसी साहब से रंविद्रालय में आयोजित मुशायरे के पास मांगने गए। वाली आसी ने कहा कि पास तो मिल जाएंगे लेकिन एक शर्त है। तुम्हें भी मुशायरे में शायरी करनी होगी। फिर क्या मुनव्वर को तो पास चाहिए ही थे। यहीं से उनके शेयरों-शायरी का सफर शुरू हो गया। (मैंने जो उनके बारे में पढ़ा)।
आज मुनव्वर साहब दुनिया भर में गजल और शायरी के दीवानों के दिलों पर राज कर रहे हैं। उनको महबूब और महबूबा की मोहब्बत की पर्याय बनी गजल और शायरी को मां की मैली ओढऩी ओढ़ाकर उसे संजीदगी और पाकीजगी अता करने वाले अजीम शायर के रूप में जाना जाता है। वे महज वाह, वाह! तक सीमित गजल को सुनने वाले का गला रुंधने और आंखें छलछला उठने तक ले गए। उन्होंने हर इंसान के अंदर मां के प्रति मौजूद मोहब्बत के दरिया को आंखों के सहारे बहकर बाहर आने का रास्ता दिखाया। आप यहां उनकी कुछ शायरी पढ़ लें...।
कुछ इस तरह मेरे गुनाहों को धो देती है
मां जब बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है।
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आए अंधेरे देख ले मुंह तेरा काला हो गया
मां ने आंखें खोल दीं घर में उजाला हो गया।
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हमारे कुछ गुनाहों की सजा भी साथ चलती है
हम अब तनहा नहीं चलते दवा भी साथ चलती है
अभी जिंदा है मां मेरी मुझे कुछ नहीं होगा
मैं घर से जब निकलता हूं दुआ भी साथ चलती है।
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उन घरों में जहां मिट्टी के घड़े होते हैं
कद के छोटे हों मगर लोग बड़े होते हैं।
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...गजल तो फूल से बच्चों की मीठी मुस्कुराहट है
गजल के साथ इतनी रुस्तमी अच्छी नहीं होती
मुनव्वर मां के आगे यूं कभी खुलकर नहीं रोना
जहां बुनियाद हो वहां नमी अच्छी नहीं होती।
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... खाने की चीजें मां ने जो भेजी हैं गांव से
बासी भी हो गईं हैं तो लज्जत वही रही।
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मेरी ख्वाहिश है कि फिर से मैं फरिश्ता हो जाऊं
मां से इस तरह लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊं।
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जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है
मां दुआ करती हुई ख्वाब में आ जाती है...
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लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
बस एक मां है जो मुझसे खफा नहीं होती।
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किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई
मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में मां आई।
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ये ऐसा कर्ज है जो मैं अदा कर नहीं सकता
मैं जब तक घर न लौटूं मेरी मां सजदे में रहती है।
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क्रमश:
आंखों देखा मुनव्वर...।



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Yaar Baba...Ab tum mere jaise ho gaye ho

पता नहीं कितने लोगों ने बचपन में बाबा(दादा) -दादी का प्यार पाया होगा। इस खूबसूरत रिश्ते को जिया होगा। मैंने तो जिया है। वो भी गांव वाला खाटी रिश्ता। जो चीनी नहीं गुड़ सा मीठा होता है। बहुत सोंधा होता है। इस सोंधे शब्द को वो ही समझ सकते हैं जिनकी जड़ें आज भी गांव में जीवित है।
ये दादी-बाबा मम्मी-पापा से भी ज्यादा प्यारे होते हैं। इसमें से दादी के पास तो आपकी हर समस्या का समाधान होता है वहीँ बाबा आपकी हर समस्या में साथ खड़े होने वाले सच्चे दोस्त होते हैं। आपकी बेसिर पैर की हर जिद को पुरा कराने की वो सिफारिश करते हैं।
मेरा भी बाबा से आत्मीय जुड़ाव रहा। जो बात मैं अपने चार साल के दोस्त से साझा करता था वह बाबा से भी कर लेता। उनके कंधों पर सवार होकर मैंने बागों और खेत-खलिहानों की सैर की। नहर में उनकी टांग को पकड़ कर तैरना सीखा। बरसात में उफनाए तालाबों से जिद कर फूल तुड़वाए। और भी न जाने क्या क्या, पूरी हुई ख्वाहिशों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। पांच साल की उम्र तक का अगर कुछ याद आता है तो वह बाबा का याराना ही है।
गांव से पढ़ाई के लिए बाहर आने, कई शहरों में उच्च शिक्षा गृहण करने और फिर नौकरी तक का 27 साल का सफर पूरा हो चुका है। मगर आज भी उस गुड़ जैसे रिश्ते की मिठास मुंह में घुली महसूस करता हूं। दादी अब हमारे बीच नहीं रहीं लेकिन बाबा से अपनी दोस्ती आज भी उतनी ही गाढ़ी है। हां, हमारे रिश्ते में कुछ चीजे अब बदल गई हैं। अब मैं नहीं बाबा जिद करते हैं जो सबको बेसिर पैर की लगती हैं। लेकिन मुझे नहीं। और अब मैं उन्हें पूरा कराने की सिफारिश करता हूं।



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बुधवार, 12 अक्टूबर 2016

Jubaan par isq ka namak rakhne ka jurm

छी... एक मेहतर जाति के लड़के संग मुंह काला करवा आई
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- पता हइ रामू अहीर के हियां भंगियाइंदि लग गई है। गाउं वाले वहिके हियां कैसेउ नेउता मा शामिल न हुइबे की बात कर रहे हईं।
-लेकिन भैया भंगियाइंदि लगी काहे
-अरे वहिकी नातिन नाइ है गंगा, वहिकी ढेर जवानी चर्राई है। वहिका गांउ के भंगिन के लडि़का संग देखो गओ।
- संग देखो गओ को का मतलब।
- अरे चुतियन वाली बात न करो कराउ। देखो गओ को मतलब मुंह करिया करवाई रही हती अउर का।
-अच्छा, मतलब दोनों गंदो काम करति देखे गए।
-अरे काम करति तउ नाइ देखे गए लेकिन फिर स्कूल मा वह भंगेवा संग का हवन कर रही हती।

इसे पढ़कर आपको एक बार शायद ऐसा भी लगा होगा कि उक्त प्रसंग मुंशी प्रेमचंद के किसी उपन्यास का अंश होगा। लेकिन ऐसा नहीं है। यह तो समाज का नंगा सच है। वो भी मुंशी प्रेमचंद के जमाने का नहीं वीडियो जारी कर मेरा शरीर, मेरी मर्जी, मैं चाहें जिसके साथ सोउं कहने वाली दीपिका पादुकोण के जमाने का।
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ये पूरा मामला उत्तर प्रदेश के हरदोई जिला मुख्यालय से दस किलोमीटर की दूरी पर बसे एक गांव का है। जिसकी जानकारी मुझे हाल ही में वहां जाने पर हुई। साथ के कुछ लड़कों ने बताया कि कुछ दिन पहले गांव के एक अहीर परिवार की लड़की को गांव के ही मेहतर परिवार के लड़के के साथ देखा गया था(बता दूं कि सिर्फ साथ देखा गया)। धीरे-धीरे यह बात पूरे गांव में फैल गई। फिर क्या किसानी के काम से खाली बैठे लोगों के लिए यह मामला मनोरंजन का साधन बन गया। जिस परिवार से यह लड़की है वह ब्राह्मणों की बस्ती में बसा है और तरक्की कर रहा है। इसके चलते मामले में सबसे ज्यास रस तो ब्राह्मण ले रहे हैं। पुरूष ही नहीं महिलाएं भी उस 15 साल की मासूम के लिए न जाने कितने नीच शब्दों का इस्तेमाल कर रही हैं। उस लड़की का राह निकलना तक मुश्किल हो गया है। हर कोई उसे हिकारत भरी नजरों से देख रहा है। शरारती तत्व तो छेड़ने से भी बाज नहीं आ रहे हैं।
इस पूरे मामले को लेकर कुछ ब्राह्मणों ने तो उस परिवार के यहां किसी भी प्रकार के भोज में शामिल न होने का ऐलान कर दिया है। उनका कहना है कि उस परिवार की लड़की एक मेहतर (भंगी) के लड़के के साथ मुंह काला करा आई है। उसके घर में भंगियाइंद लग गई है, घर अछूत हो गया है। ऐसे में उसके यहां खाकर क्या अपना धर्म भ्रष्ट कर लें।
यहां मैं इन नंगों के सच से भी अवगत करा दूं। आज से कुछ साल पहले इन ऐलान करने वाले कुछ ब्राह्मणों की लड़कियां ठाकुरों के लड़कों के साथ अलग-अलग समय पर देखी गई थीं। लेकिन तब इनका घर अछूत नहीं हुआ था। न ही इनका घर तब अछूत होता है जब इनके लड़के गांव के हरिजनों और धनुकों की लड़कियों के साथ देखे जाते हैं। मुझे समझ ये नहीं आता कि इन कुकुरमुत्तों ने कौन सा ऐसा धर्मशास्त्र या समाजशास्त्र पढ़ लिया, जिसमें ये बदबूदार मैला भरा था। पढ़ क्या लिया, मुझे लगता है छककर खा ही लिया है।
अरे मूर्ख शिरोमणियों, साथ देखे जाने या शारीरिक संबंध बनाने से ये बच्चे अपराधी कैसे हो गए। कच्ची उम्र में बच्चों से गलतियां होना स्वाभाविक हैं। जिसपर अंकुश लगाना हमारे बस की बात नहीं है। इसके लिए समाज ने न जाने कितने प्रयास किए, न जाने कितनी कठोरतम् सजाएं दीं। लेकिन कुछ न बदला। हम अगर कुछ कर सकते हैं तो सिर्फ इतना कि हम इन्हें अच्छे और बुरे का अंतर बताने का प्रयास करें। इन्हें यह समझाने कोशिश करें कि इस उम्र में उन्हें अपनी ऊर्जा किस ओर व्यय करनी है।
अब और क्या कहूँ, मुझे तो चिंता उस मासूम बच्ची की है। न जाने अपने घर वाले ही उसके साथ कितनी बेरहमी से पेश आ रहे होंगे। वह बंदिशों की जंजीरों से न जाने किस कदर जकड़ी होगी। उस मासूम को क्या पता था कि जो दुनिया वह फिल्मों और टीवी सीरियलों में देख रही है वह रीललाइफ है। रियल लाइफ उससे बहुत अलग है। जैसे भारत और इंडिया अलग-अलग है।


(*Parts of artwork have been borrowed from the internet, with due thanks to the owner of the photograph/art)