बुधवार, 9 जनवरी 2019
सोमवार, 9 जुलाई 2018
Kashmir: Pain, Gain, Drain; But no body cares
मैं टोपी या ईद की नहीं कश्मीर की बात कर रहा हूं...
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मुझे यह टोपी 2012 में मेरी पोस्ट ग्रेजुएशन के सहपाठी Nasir Khan ने पहनाई थी। उसी ने अपने कैमरे से यह फोटो खींची थी और कहा था कि गौरव मियां गजब लग रहे हो...। नासिर कश्मीर के रहने वाले हैं या यूं कहें कि कश्मीरी हैं। इन दिनों दिल्ली में एक प्रतिष्ठित न्यूज चैनेल में बतौर वीडियो जर्नलिस्ट कार्यरत हैं।
आपको लग रहा होगा कि आखिर ईद के मौके पर मैं ये टोपी की फोटो डालकर कश्मीर की बात क्यों कर रहा हूं...? दरअसल पिछले दिनों से लगातार चल रहे घटनाक्रमों ने मेरे अंदर कश्मीर शब्द को लेकर ही नफरत पैदा कर दी है। हर दिन अखबार के पहले पेज पर श्रीनगर डेटलाइन से एक न एक खबर आंखों के सामने होती है। जिस तरह की घटनाओं से रूबरू कराया जा रहा है, उनके चलते ही मेरे अंदर यह नफरत घर कर रही है।
लेकिन अचानक आज ईद आई तो मुझे मेरा कश्मीरी साथी नासिर याद आ गया। नासिर उन चंद साथियों में से एक है जो मेरे बेरोजगारी के दौर में दिल्ली में मुझे नौकरी दिलाने के प्रयास में लगा था। इसके बाद मुझे उसके द्वारा खींची अपनी टोपी वाली यह फोटो भी याद आ गई।
इन सबने मुझे फिर सोचने पर विवश कर दिया। फिर सवाल उठे कि क्या हर कश्मीरी भारत और हर भारतीय से सिर्फ नफरत करता है...? क्या हर कश्मीरी भारत से अलग होने की मांग कर रहा है...? क्या हर कश्मीरी आतंकियों, घुसपैठियों का साथ देकर सैनिकों के साथ बर्बरता और भारतविरोधी गतिविधियों का हिस्सा है...? या महज 20 फीसदी आबादी अन्य 80 फीसदी आबादी के चेहरे के रूप में हमें दिखाई जा रही है।
यहां मुझे पोस्ट ग्रेजुएशन के दिनों की ही कश्मीरी साथी तबस्सुम और उसके द्वारा साझा की गई, उनके परिवार के साथ घटी अनहोनी घटना भी याद आ रही है।
उलझ सा गया हूं। जवाब नहीं मिल रहा है। हां, ये जरूर लगता है कि कश्मीर के मसले को सुलझाने के संजीदा प्रयास नहीं हो रहे हैं। सिर्फ निंदा, बयानबाजी और एक के बदले 10 सिरों तक सबकुछ सीमित होकर रह गया है। कैसे चतुराई से हम अखबारी दुनिया में पहले दो आतंकी ढेर और फिर एक जवान शहीद लिख देते हैं। ऐसा लगता है कि मौत का आंकड़ा महज फुटबॉल मैच का स्कोर हो। हमारा एक मरा है तो क्या हुआ, हमने तो उनके दो मारे हैं न...। ईश्वर न करे कि इन खबरों को लिखने, खबरों को बताने और इसके जिम्मेदार लोगों को अपने बेटों की अर्थी को कांधा देने का बोझ कभी उठाना पड़े। खुदा न करे इन्हें अपनी बेटियों और बहुओं की मांग से छुड़ाए जाते सिंदूर का साक्षी होना पड़े। यह सब फुटबॉल के स्कोर के बाद में शहीद सैनिकों के घरों में उफनाने वाला दर्द का दरिया होता है। जो बहुत कुछ हमेशा के लिए अपने साथ बहा ले जाता है।
खैर एक बात मान लीजिए कश्मीर में आज जो नफरत की फिजा बह रही है वह एक दो दिन नहीं बल्कि दशकों से बोई और सींची गई फसल है। जो पककर तैयार हो रही है। हम आप तो आम आदमी हैं, हम में से अधिकांश तो अभी कश्मीर घूमने तक नहीं गए। लेकिन जो सत्ताधीश बने बैठे हैं, उनसे क्या छिपा है। उन्हें तो पता ही होता है न कि देश के किस हिस्से में क्या चल रहा है। लेकिन मंशा ठीक हो तब न। समस्या के समाधान से ज्यादा जोर चीजों को राजनीतिक रंग देने पर दिया जा रहा है। अन्ना हजारे मिले थे, तो कह रहे थे कि सत्ता परिवर्तत तो हुआ है, लेकिन व्यवस्था परिवर्तन नहीं हुआ। सच कह रहे थे, कुछ मुद्दों को लेकर कुछ भी तो नहीं बदला है।
अंत में मैं तो बस इतना ही कहूंगा कि हमें सिक्के के दोनों पहलू देखने चाहिए। क्योंकि अधूरा सच बताकर और दिखाकर हमसे बात की सच्चाई तक पहुंचने का हक छीना जा रहा है। हमें सिर्फ एक पहलू देखने के लिए बाध्य किया जा रहा है। यही नहीं हमें असल मुद्दों से भटकाने के लिए देशभक्ति, हिन्दुत्व, इस्लाम का सहारा लेकर गुमराह किया जा रहा है। हमें इन सबसे बचना है। हो सके तो अखबारों, टीवी चैनलों, फेसबुक के वाहियात ग्रुप और लोगों से दूरी बना लें। क्योंकि आज इन माध्यमों में नफरत से बुझे शब्दों की संख्या अमन और मोहब्बत के शब्दों से कहीं ज्यादा हो गई है। हमें इनसे दूरी रखते हुए अपने अंदर घटनाओं को अपने चश्मे से देखने की क्षमता पैदा करनी होगी।
यहां दुष्यंत कुमार साहब का शेर याद आ रहा है...
रहनुमाओं की अदाओं पे फिदा है दुनिया,
इस बहकती हुई दुनिया को संभालो यारों...।
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सभी को चांद की दीद और मीठी ईद मुबारक।
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मुझे यह टोपी 2012 में मेरी पोस्ट ग्रेजुएशन के सहपाठी Nasir Khan ने पहनाई थी। उसी ने अपने कैमरे से यह फोटो खींची थी और कहा था कि गौरव मियां गजब लग रहे हो...। नासिर कश्मीर के रहने वाले हैं या यूं कहें कि कश्मीरी हैं। इन दिनों दिल्ली में एक प्रतिष्ठित न्यूज चैनेल में बतौर वीडियो जर्नलिस्ट कार्यरत हैं।
आपको लग रहा होगा कि आखिर ईद के मौके पर मैं ये टोपी की फोटो डालकर कश्मीर की बात क्यों कर रहा हूं...? दरअसल पिछले दिनों से लगातार चल रहे घटनाक्रमों ने मेरे अंदर कश्मीर शब्द को लेकर ही नफरत पैदा कर दी है। हर दिन अखबार के पहले पेज पर श्रीनगर डेटलाइन से एक न एक खबर आंखों के सामने होती है। जिस तरह की घटनाओं से रूबरू कराया जा रहा है, उनके चलते ही मेरे अंदर यह नफरत घर कर रही है।
लेकिन अचानक आज ईद आई तो मुझे मेरा कश्मीरी साथी नासिर याद आ गया। नासिर उन चंद साथियों में से एक है जो मेरे बेरोजगारी के दौर में दिल्ली में मुझे नौकरी दिलाने के प्रयास में लगा था। इसके बाद मुझे उसके द्वारा खींची अपनी टोपी वाली यह फोटो भी याद आ गई।
इन सबने मुझे फिर सोचने पर विवश कर दिया। फिर सवाल उठे कि क्या हर कश्मीरी भारत और हर भारतीय से सिर्फ नफरत करता है...? क्या हर कश्मीरी भारत से अलग होने की मांग कर रहा है...? क्या हर कश्मीरी आतंकियों, घुसपैठियों का साथ देकर सैनिकों के साथ बर्बरता और भारतविरोधी गतिविधियों का हिस्सा है...? या महज 20 फीसदी आबादी अन्य 80 फीसदी आबादी के चेहरे के रूप में हमें दिखाई जा रही है।
यहां मुझे पोस्ट ग्रेजुएशन के दिनों की ही कश्मीरी साथी तबस्सुम और उसके द्वारा साझा की गई, उनके परिवार के साथ घटी अनहोनी घटना भी याद आ रही है।
उलझ सा गया हूं। जवाब नहीं मिल रहा है। हां, ये जरूर लगता है कि कश्मीर के मसले को सुलझाने के संजीदा प्रयास नहीं हो रहे हैं। सिर्फ निंदा, बयानबाजी और एक के बदले 10 सिरों तक सबकुछ सीमित होकर रह गया है। कैसे चतुराई से हम अखबारी दुनिया में पहले दो आतंकी ढेर और फिर एक जवान शहीद लिख देते हैं। ऐसा लगता है कि मौत का आंकड़ा महज फुटबॉल मैच का स्कोर हो। हमारा एक मरा है तो क्या हुआ, हमने तो उनके दो मारे हैं न...। ईश्वर न करे कि इन खबरों को लिखने, खबरों को बताने और इसके जिम्मेदार लोगों को अपने बेटों की अर्थी को कांधा देने का बोझ कभी उठाना पड़े। खुदा न करे इन्हें अपनी बेटियों और बहुओं की मांग से छुड़ाए जाते सिंदूर का साक्षी होना पड़े। यह सब फुटबॉल के स्कोर के बाद में शहीद सैनिकों के घरों में उफनाने वाला दर्द का दरिया होता है। जो बहुत कुछ हमेशा के लिए अपने साथ बहा ले जाता है।
खैर एक बात मान लीजिए कश्मीर में आज जो नफरत की फिजा बह रही है वह एक दो दिन नहीं बल्कि दशकों से बोई और सींची गई फसल है। जो पककर तैयार हो रही है। हम आप तो आम आदमी हैं, हम में से अधिकांश तो अभी कश्मीर घूमने तक नहीं गए। लेकिन जो सत्ताधीश बने बैठे हैं, उनसे क्या छिपा है। उन्हें तो पता ही होता है न कि देश के किस हिस्से में क्या चल रहा है। लेकिन मंशा ठीक हो तब न। समस्या के समाधान से ज्यादा जोर चीजों को राजनीतिक रंग देने पर दिया जा रहा है। अन्ना हजारे मिले थे, तो कह रहे थे कि सत्ता परिवर्तत तो हुआ है, लेकिन व्यवस्था परिवर्तन नहीं हुआ। सच कह रहे थे, कुछ मुद्दों को लेकर कुछ भी तो नहीं बदला है।
अंत में मैं तो बस इतना ही कहूंगा कि हमें सिक्के के दोनों पहलू देखने चाहिए। क्योंकि अधूरा सच बताकर और दिखाकर हमसे बात की सच्चाई तक पहुंचने का हक छीना जा रहा है। हमें सिर्फ एक पहलू देखने के लिए बाध्य किया जा रहा है। यही नहीं हमें असल मुद्दों से भटकाने के लिए देशभक्ति, हिन्दुत्व, इस्लाम का सहारा लेकर गुमराह किया जा रहा है। हमें इन सबसे बचना है। हो सके तो अखबारों, टीवी चैनलों, फेसबुक के वाहियात ग्रुप और लोगों से दूरी बना लें। क्योंकि आज इन माध्यमों में नफरत से बुझे शब्दों की संख्या अमन और मोहब्बत के शब्दों से कहीं ज्यादा हो गई है। हमें इनसे दूरी रखते हुए अपने अंदर घटनाओं को अपने चश्मे से देखने की क्षमता पैदा करनी होगी।
यहां दुष्यंत कुमार साहब का शेर याद आ रहा है...
रहनुमाओं की अदाओं पे फिदा है दुनिया,
इस बहकती हुई दुनिया को संभालो यारों...।
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सभी को चांद की दीद और मीठी ईद मुबारक।
वो मिट्टी में सने हैं तो आपके लिए
वृक्ष की जड़ जिंदगी भर मिट्टी से सनी और उसमें दबी रहती है। तब जाकर कहीं वह साखों के लिए पानी और पोषक तत्व जुटाती रहती है। इन्हीं साखों पर जब फूल और फल आते हैं तो साखों और तने संग जड़ भी अह्लादित हो स्थिर रहकर भी झूम उठती है। पुष्प व फल की खूबसूरती, सुगंध व स्वाद देख वह अपने बलिदान को सार्थक मानती है और उसे निरंतर जारी रखती है। लेकिन अक्सर फल और फूल इस बलिदान को भूल जाते हैं।
मुनव्वर राना कहते हैं न कि पत्ते देहाती रहते हैं और फल शहरी हो जाते हैं। ये खुद को शहरी समझने वाले कुछ फल पत्तों और जड़ों को निम्न समझने लगते हैं। लेकिन वो नहीं समझ पाते कि जब जड़ को उपेक्षा की दीमक लगती है तो पत्ते और फल सब सूखकर झड़ ही जाते हैं।
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आप समझ रहे होंगे कि क्या कहने की कोशिश है। जिन देहाती जड़ों को चूंसकर आप शहरी इंजीनियर, डॉक्टर, पायलट से लेकर एस्ट्रोनॉट तक बने और मुंबई, दिल्ली से लेकर न्यूयॉर्क तक में जाकर बस गए हो, उन्हें भूलो नहीं। आप भले चटख चमकीले रंग के हैं और वो मिट्टी से सने धूल धूसरित हैं, लेकिन उनके बारे में किसी को बताने में शर्म न करो। वक्त-वक्त पर आकर उन्हें स्नेह की खाद और विश्वास का पानी देते रहो। अगर आपकी उपेक्षा की दीमक उन्हें लगी तो आज आप भले शिखर की ओर हों लेकिन आपका पतन तय है। भले देर से हो, मगर होगा जरूर। क्योंकि, यही प्रकृति का नियम है।
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आप समझ रहे होंगे कि क्या कहने की कोशिश है। जिन देहाती जड़ों को चूंसकर आप शहरी इंजीनियर, डॉक्टर, पायलट से लेकर एस्ट्रोनॉट तक बने और मुंबई, दिल्ली से लेकर न्यूयॉर्क तक में जाकर बस गए हो, उन्हें भूलो नहीं। आप भले चटख चमकीले रंग के हैं और वो मिट्टी से सने धूल धूसरित हैं, लेकिन उनके बारे में किसी को बताने में शर्म न करो। वक्त-वक्त पर आकर उन्हें स्नेह की खाद और विश्वास का पानी देते रहो। अगर आपकी उपेक्षा की दीमक उन्हें लगी तो आज आप भले शिखर की ओर हों लेकिन आपका पतन तय है। भले देर से हो, मगर होगा जरूर। क्योंकि, यही प्रकृति का नियम है।
(2015 की एक यात्रा- अंतिम कड़ी)
जिंदगी में हर घटना के पीछे कोई न कोई कारण होता है... इस घटना के पीछे का कारण जब जाना तो आंखों से आंसू बहने लगे
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कुछ ही देर बाद रिक्शा वाले ने तीन चार अस्पतालों वाले इलाके में पहुंचा दिया। मैं हैरान परेशान पहले एक अस्पताल में घुसा। डॉक्टर का पता किया तो उपलब्ध नहीं थे। तीनों अस्पतालों की यही स्थिति थी। सभी अस्पतलों में ओपीडी शुरू होने वाली थीं। मरीजों की लंबी कतार थीं। अंत में एक अस्पताल में गया तो डॉक्टर के रूम के बाहर ही उसका असिस्टेंट बीपी नापने वाली मशीन लिए बैठे दिखा। उससे बीपी नापने का अग्रह किया तो उसने साफ मना कर दिया। बोला कि पहले फीस भरकर पर्चा बनावकर आओ। मैंने पूछा कि डॉक्टर कितनी देर में बैंठेंगे तो उसने बताया कि एक घंटे बाद। भीड़ की तरफ देखा तो हिम्मत जवाब दे गई। मैंने उससे फिर आग्रह किया कि भाई मैं डॉक्टर को नहीं दिखाना चाहता, मुझे तो बस बीपी चेक कराना है। उसने फिर मना कर दिया। मैंने भोली और उदास सी सूरत लिए फिर अनुरोध किया तो वो मान गया। बीपी चेक किया, नॉर्मल निकला। मैं फिर हैरान था। अब तो बीपी भी नॉर्मल है तो फिर चक्कर क्यों आए। अस्पतालों के चक्कर लगाने के दौरान ये भी ध्यान में नहीं आया कि वहां कि इमरजेंसी सेवा लेकर ही बीपी चेक करवा लूं।
खैर, डॉक्टर दोस्त को बीपी के बारे में बताया और उसके द्वारा बताई गईं दवाएं ले लीं। अब यहां से चलने की बारी थी। रास्ता पता किया और पैदल ही चल दिया। कुछ ही देर में उस मुख्य सड़क पर आ गया, जहां से अस्पताल ले जाने में रिक्शे वाले ने न जाने कितना घुमाया था। मतलब जेब पर डाका डालने के लिए रिक्शे वाले भाई ने यूंही न जाने गोरखपुर की कौन-कौन सी कुंज गलियों का भ्रमण करा दिया था।
अब इरादा साफ हो चुका था कि रास्ता काठमांडु का नहीं, हरदोई का पकड़ना था। लौटने का रिजर्वेशन काम नहीं आना था, क्योंकि वह दो दिन बाद का था। तो अब बारी धक्का खाते हुए घर लौटने की थी। इन धक्कों की कोई चिंता नहीं थी, मन व्यथित था तो पहली बार अकेले निकलने वाली यात्रा के असफल होने से। डूबे मन और डबडबाई आंखों से रेलवे स्टेशन पहुंचा। ट्रेन का पता किया तो जानकारी मिली कि आज गोरखपुर से मुंबई के लिए नई ट्रेन शुरू हो रही है। गया तो प्लेटफॉर्म पर सजी-धजी ट्रेन खड़ी मिली। आसानी से सीट मिल गई। करीब एक घंटे बाद ट्रेन चल दी। दवा का असर हुआ और गहरी नींद आ गई। सफर का पता ही नहीं चला। लखनऊ पहुंचने से पहले ही घर फोन करके मां से कह दिया कि मेरे लिए भी खाना बना लेना। उन्होंने जल्दी लौटने का कारण पूछा तो मैंने कह दिया कि लौट कर बताऊंगा। मुझे डर था कि अगर उन्हें तबीयत खराब की बात बताई तो वे घबरा जाएंगी। रात तक घर पहुंच भी गया। तमाम नशीहतें मिलीं। हालांकि, मैं हमेशा की तरह जीवन की इस घटना के कारणों को जानने की कोशिश कर रहा था। मैं जानना चाहता कि इस घटना के जरिये आखिर ईश्वर क्या कहने की कोशिश कर रहा है। उस दिन इसका कोई जवाब नहीं मिला।
मेरे लौटने केे दो दिन बाद यानी 25 अप्रैल 2015 को नेपाल में 7.9 की तीव्रता वाला भयानक भूकंप आया। इसमें 8000 से अधिक लोग मारे गए। दूरसंचार समेत सभी सेवाएं लगभग ठप हो गईं। इस समाचार को देखते हुए मैं पहले स्तब्ध हुआ और फिर मेरी आंखों से आंसू बहने लगे। मुझे मेरी असफल यात्रा के पीछे का जवाब मिल गया था। मुझे रास्ते में ही रोके जाने का जवाब मिल गया था। मैं आंखें बंद कर काफी देर तक लेटा रहा। गालों पर बहकर आए आसुंओं के सूखने के संग मैं अपने सिर पर उसके हाथ के स्पर्श को महसूस कर रहा था।
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आज यह लिखते हुए उस दिन के बारे में सोचकर रोंगटे खड़े हो रहे हैं। उठाने वाले ईश्वर के अस्तित्व पर तक सवाल उठा रहे हैं, उन्हें उठाना भी चाहिए। मैं कैसे उठाऊं मैंने तो उसकी गंध को, उसके स्पर्श को कई दफा महसूस किया है।
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कुछ ही देर बाद रिक्शा वाले ने तीन चार अस्पतालों वाले इलाके में पहुंचा दिया। मैं हैरान परेशान पहले एक अस्पताल में घुसा। डॉक्टर का पता किया तो उपलब्ध नहीं थे। तीनों अस्पतालों की यही स्थिति थी। सभी अस्पतलों में ओपीडी शुरू होने वाली थीं। मरीजों की लंबी कतार थीं। अंत में एक अस्पताल में गया तो डॉक्टर के रूम के बाहर ही उसका असिस्टेंट बीपी नापने वाली मशीन लिए बैठे दिखा। उससे बीपी नापने का अग्रह किया तो उसने साफ मना कर दिया। बोला कि पहले फीस भरकर पर्चा बनावकर आओ। मैंने पूछा कि डॉक्टर कितनी देर में बैंठेंगे तो उसने बताया कि एक घंटे बाद। भीड़ की तरफ देखा तो हिम्मत जवाब दे गई। मैंने उससे फिर आग्रह किया कि भाई मैं डॉक्टर को नहीं दिखाना चाहता, मुझे तो बस बीपी चेक कराना है। उसने फिर मना कर दिया। मैंने भोली और उदास सी सूरत लिए फिर अनुरोध किया तो वो मान गया। बीपी चेक किया, नॉर्मल निकला। मैं फिर हैरान था। अब तो बीपी भी नॉर्मल है तो फिर चक्कर क्यों आए। अस्पतालों के चक्कर लगाने के दौरान ये भी ध्यान में नहीं आया कि वहां कि इमरजेंसी सेवा लेकर ही बीपी चेक करवा लूं।
खैर, डॉक्टर दोस्त को बीपी के बारे में बताया और उसके द्वारा बताई गईं दवाएं ले लीं। अब यहां से चलने की बारी थी। रास्ता पता किया और पैदल ही चल दिया। कुछ ही देर में उस मुख्य सड़क पर आ गया, जहां से अस्पताल ले जाने में रिक्शे वाले ने न जाने कितना घुमाया था। मतलब जेब पर डाका डालने के लिए रिक्शे वाले भाई ने यूंही न जाने गोरखपुर की कौन-कौन सी कुंज गलियों का भ्रमण करा दिया था।
अब इरादा साफ हो चुका था कि रास्ता काठमांडु का नहीं, हरदोई का पकड़ना था। लौटने का रिजर्वेशन काम नहीं आना था, क्योंकि वह दो दिन बाद का था। तो अब बारी धक्का खाते हुए घर लौटने की थी। इन धक्कों की कोई चिंता नहीं थी, मन व्यथित था तो पहली बार अकेले निकलने वाली यात्रा के असफल होने से। डूबे मन और डबडबाई आंखों से रेलवे स्टेशन पहुंचा। ट्रेन का पता किया तो जानकारी मिली कि आज गोरखपुर से मुंबई के लिए नई ट्रेन शुरू हो रही है। गया तो प्लेटफॉर्म पर सजी-धजी ट्रेन खड़ी मिली। आसानी से सीट मिल गई। करीब एक घंटे बाद ट्रेन चल दी। दवा का असर हुआ और गहरी नींद आ गई। सफर का पता ही नहीं चला। लखनऊ पहुंचने से पहले ही घर फोन करके मां से कह दिया कि मेरे लिए भी खाना बना लेना। उन्होंने जल्दी लौटने का कारण पूछा तो मैंने कह दिया कि लौट कर बताऊंगा। मुझे डर था कि अगर उन्हें तबीयत खराब की बात बताई तो वे घबरा जाएंगी। रात तक घर पहुंच भी गया। तमाम नशीहतें मिलीं। हालांकि, मैं हमेशा की तरह जीवन की इस घटना के कारणों को जानने की कोशिश कर रहा था। मैं जानना चाहता कि इस घटना के जरिये आखिर ईश्वर क्या कहने की कोशिश कर रहा है। उस दिन इसका कोई जवाब नहीं मिला।
मेरे लौटने केे दो दिन बाद यानी 25 अप्रैल 2015 को नेपाल में 7.9 की तीव्रता वाला भयानक भूकंप आया। इसमें 8000 से अधिक लोग मारे गए। दूरसंचार समेत सभी सेवाएं लगभग ठप हो गईं। इस समाचार को देखते हुए मैं पहले स्तब्ध हुआ और फिर मेरी आंखों से आंसू बहने लगे। मुझे मेरी असफल यात्रा के पीछे का जवाब मिल गया था। मुझे रास्ते में ही रोके जाने का जवाब मिल गया था। मैं आंखें बंद कर काफी देर तक लेटा रहा। गालों पर बहकर आए आसुंओं के सूखने के संग मैं अपने सिर पर उसके हाथ के स्पर्श को महसूस कर रहा था।
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आज यह लिखते हुए उस दिन के बारे में सोचकर रोंगटे खड़े हो रहे हैं। उठाने वाले ईश्वर के अस्तित्व पर तक सवाल उठा रहे हैं, उन्हें उठाना भी चाहिए। मैं कैसे उठाऊं मैंने तो उसकी गंध को, उसके स्पर्श को कई दफा महसूस किया है।
(*Parts of artwork have been borrowed from the internet, with due thanks to the owner of the photograph/art)
2015 की एक यात्रा: पार्ट-2
(अब मैं मानो मझधार में फंस चुका था...)
ट्रेन में मुझे दूसरी बार चक्कर आ चुका था। परेशान से ज्यादा मैं हैरान था। लोगों ने फिर से मुझे उठाकर पास की सीट पर बैठा दिया था। ऐसा भी नहीं था कि मुझे किसी प्रकार की कमजोरी महसूस हो रही हो। मैं साधारण तरीके से चल और उठ-बैठ रहा था। दिमाग सेंटर में आने के बाद मैं वापस अपनी सीट पर लौट गया। आगे की यात्रा करने की हिम्मत कुछ कमजोर पड़ रही थी, लेकिन मैं मन को समझा रहा था कि नहीं मैं तो जाऊंगा ही।
मुझे थोड़ा उदास देखकर पास में बैठे सज्जन ने पूछ लिया कि क्या हो गया परेशान दिख रहे हो। इससे पहले हुई वार्तालाप में मैंने उनसे यह साझा नहीं किया था कि मैं काठमांडु जा रहा हूं। लेकिन मैंने उन्हें दोबारा चक्कर आने की बात साझा करने के यह भी बता दिया कि मैं काठमांडु के लिए निकला हूं। इस पर उन्होंने मुझे काठमांडु का सफर न करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि सोनौली बॉर्डर पार करने के बाद काठमांडु पहुंचने के लिए कई घंटे का पर्वतीय सफर तय करना होगा। मुझे पहले से चक्कर आ रहे हैं और मैं अकेला भी हूं, ऐसे में परेशानी बढ़ सकती है। और फिर मैं दूसरे देश में भी जा रहा हूं, इसलिए मुझे यह जोखिम नहीं लेना चाहिए।
मैं सोच में पड़ गया कि अब आखिर मैं क्या करूं। लगभग आधा सफर मैं तय कर चुका था। यहां से वापस भी कैसे लौटूं। इसके बाद मन में अजीब-अजीब खयाल घर करने लगे।
ट्रेन का टिकट मैंने घर यानी कि हरदोई से ही कराया था। मुझे 150 से ज्यादा की वेटिंग मिली थी। इसके बावजूद मेरी टिकट कन्फर्म हो गई थी। इसे भी मैं पशुपतिनाथ बाबा की कृपा ही मान रहा था। अकेले इनते लंबे सफर पर निकलने का यह मेरा पहला अनुभव था और मैं अब मानो मझधार में फंस चुका था। अंत में मैंने फैसला किया कि गोरखपुर में उतरने के बाद आगे के बारे में सोचूंगा। वहीं, साथ में बैठे सज्जन मुझे सलाह दे रहे थे कि मैं अगली ट्रेन से वापस लौट जाऊं या डॉक्टर से परामर्श लेकर दवा लूं और गोरखपुर में ही होटल लेकर आराम करूं व अगले दिन ट्रेन से घर चला जाऊं।
इन सब उधेड़-बुनों के बीच ट्रेन गोरखपुर पहुंच गई। रेलवे स्टेशन से बाहर आते ही मैंने अपने एक डॉक्टर दोस्त को कॉल किया। उसे पूरी समस्या से अवगत कराया। उसने कमजोरी की वजह से ऐसा होने की आशंका व्यक्त की और ज्यूस पीने व कुछ हलका खा लेने की सलाह दी। मैंने स्टेशन परिसर से बाहर आकर एक बड़ा गिलास अनार का ज्यूस निकलवाया और पी गया। जैसे ही ज्यूस वाले को पैसे दिए, मुझे जोस से उल्टी आई। मैं वहीं बैठ गया। लगभग सारा ज्यूस बाहर आ चुका था। सिर सुन हो गया और मैं थोड़ा घबरा गया। एक उलटी से ही हालत ऐसी हो गई कि उठने की हिम्मत नहीं हो रही थी। आसपास से लोग गुजर रहे थे, लेकिन कोई पानी देने वाला तक नहीं था।
जैसे-तैसे उठा और फिर से अपने डॉक्टर दोस्त को फोन लगाया। उसने कहा कि बीपी का मामला लग रहा है। किसी डॉक्टर को दिखा लो या कहीं से बीपी चेक करवा लो। मैंने डॉक्टर की खोज शुरू की। कुछ समझ नहीं आया तो सीधे एक रिक्शा पकड़ा। रिक्श्ोवाले से कहा कि भाई किसी भी डॉक्टर के पास लेचलो। इसके बाद रिक्शा पहले सड़क और फिर गलियों में चल रहा था। गलियां ऐसी सुनसान थीं कि डर लगने लगा था कि यहां कहीं मेरा सामान ही न छिन जाए।
मुझे थोड़ा उदास देखकर पास में बैठे सज्जन ने पूछ लिया कि क्या हो गया परेशान दिख रहे हो। इससे पहले हुई वार्तालाप में मैंने उनसे यह साझा नहीं किया था कि मैं काठमांडु जा रहा हूं। लेकिन मैंने उन्हें दोबारा चक्कर आने की बात साझा करने के यह भी बता दिया कि मैं काठमांडु के लिए निकला हूं। इस पर उन्होंने मुझे काठमांडु का सफर न करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि सोनौली बॉर्डर पार करने के बाद काठमांडु पहुंचने के लिए कई घंटे का पर्वतीय सफर तय करना होगा। मुझे पहले से चक्कर आ रहे हैं और मैं अकेला भी हूं, ऐसे में परेशानी बढ़ सकती है। और फिर मैं दूसरे देश में भी जा रहा हूं, इसलिए मुझे यह जोखिम नहीं लेना चाहिए।
मैं सोच में पड़ गया कि अब आखिर मैं क्या करूं। लगभग आधा सफर मैं तय कर चुका था। यहां से वापस भी कैसे लौटूं। इसके बाद मन में अजीब-अजीब खयाल घर करने लगे।
ट्रेन का टिकट मैंने घर यानी कि हरदोई से ही कराया था। मुझे 150 से ज्यादा की वेटिंग मिली थी। इसके बावजूद मेरी टिकट कन्फर्म हो गई थी। इसे भी मैं पशुपतिनाथ बाबा की कृपा ही मान रहा था। अकेले इनते लंबे सफर पर निकलने का यह मेरा पहला अनुभव था और मैं अब मानो मझधार में फंस चुका था। अंत में मैंने फैसला किया कि गोरखपुर में उतरने के बाद आगे के बारे में सोचूंगा। वहीं, साथ में बैठे सज्जन मुझे सलाह दे रहे थे कि मैं अगली ट्रेन से वापस लौट जाऊं या डॉक्टर से परामर्श लेकर दवा लूं और गोरखपुर में ही होटल लेकर आराम करूं व अगले दिन ट्रेन से घर चला जाऊं।
इन सब उधेड़-बुनों के बीच ट्रेन गोरखपुर पहुंच गई। रेलवे स्टेशन से बाहर आते ही मैंने अपने एक डॉक्टर दोस्त को कॉल किया। उसे पूरी समस्या से अवगत कराया। उसने कमजोरी की वजह से ऐसा होने की आशंका व्यक्त की और ज्यूस पीने व कुछ हलका खा लेने की सलाह दी। मैंने स्टेशन परिसर से बाहर आकर एक बड़ा गिलास अनार का ज्यूस निकलवाया और पी गया। जैसे ही ज्यूस वाले को पैसे दिए, मुझे जोस से उल्टी आई। मैं वहीं बैठ गया। लगभग सारा ज्यूस बाहर आ चुका था। सिर सुन हो गया और मैं थोड़ा घबरा गया। एक उलटी से ही हालत ऐसी हो गई कि उठने की हिम्मत नहीं हो रही थी। आसपास से लोग गुजर रहे थे, लेकिन कोई पानी देने वाला तक नहीं था।
जैसे-तैसे उठा और फिर से अपने डॉक्टर दोस्त को फोन लगाया। उसने कहा कि बीपी का मामला लग रहा है। किसी डॉक्टर को दिखा लो या कहीं से बीपी चेक करवा लो। मैंने डॉक्टर की खोज शुरू की। कुछ समझ नहीं आया तो सीधे एक रिक्शा पकड़ा। रिक्श्ोवाले से कहा कि भाई किसी भी डॉक्टर के पास लेचलो। इसके बाद रिक्शा पहले सड़क और फिर गलियों में चल रहा था। गलियां ऐसी सुनसान थीं कि डर लगने लगा था कि यहां कहीं मेरा सामान ही न छिन जाए।
2015 की एक यात्रा- पार्ट 1
(आंख खुली तो मैंने खुद को कोच की फर्श पर पड़ा पाया)
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सुबह के 9 बज रहे थे। मैं ट्रेन के स्लीपर कोच की अपनी अपर बर्थ पर सोया था। गर्मी बढ़ने के चलते मेरी नींद खुली। नीचे झांकर देखा तो मिडिल बर्थ खुल चुकी थी और रिजर्वेशनधारकों के साथ दैनिक यात्री बैठकर बाते कर रहे थे। देर तक लेट-लेटे शरीर में हलका दर्द होने लगा था। मैं नीचे उतरा और जगह बनाकर बैठ गया। कुछ देर हवा खाने के बाद मैं वाशरूम के लिए गया। अपने कम्पार्टमेंट से कुछ ही दूर पहुंचा था कि कदम ठिठक गए। पहले आंखों के सामने हलका अंधेरा आया और फिर ब्लैक आउट हो गया। आंख खुली तो मैं कोच की फर्श पर पड़ा था। वहीं बैठे लोगों ने मुझे उठने में मदद की और अपनी सीट पर बैठा लिया। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर मेरा साथ हुआ क्या है।
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सुबह के 9 बज रहे थे। मैं ट्रेन के स्लीपर कोच की अपनी अपर बर्थ पर सोया था। गर्मी बढ़ने के चलते मेरी नींद खुली। नीचे झांकर देखा तो मिडिल बर्थ खुल चुकी थी और रिजर्वेशनधारकों के साथ दैनिक यात्री बैठकर बाते कर रहे थे। देर तक लेट-लेटे शरीर में हलका दर्द होने लगा था। मैं नीचे उतरा और जगह बनाकर बैठ गया। कुछ देर हवा खाने के बाद मैं वाशरूम के लिए गया। अपने कम्पार्टमेंट से कुछ ही दूर पहुंचा था कि कदम ठिठक गए। पहले आंखों के सामने हलका अंधेरा आया और फिर ब्लैक आउट हो गया। आंख खुली तो मैं कोच की फर्श पर पड़ा था। वहीं बैठे लोगों ने मुझे उठने में मदद की और अपनी सीट पर बैठा लिया। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर मेरा साथ हुआ क्या है।
कुछ देर बैठने के बाद मैं साधारण महसूस करने लगा। इसके बाद वाशरूम गया और फिर वापस आकर अपनी सीट पर बैठ गया। अपने साथ हुई घटना को मैंने सीट पर साथ में बैठे एक सज्ज्न से साझा किया। उन्होंने कहा कि तुम अभी खाली पेट हो, शायद इसी वजह से ऐसे हुआ हो। मुझे उनका लॉजिक समझ तो नहीं आया, लेकिन फिर भी मैं उनकी बात पर सहमत हो गया। ट्रेन जैसे ही बस्ती स्टेशन पर रुकी मैंने एक पानी की बोतल खरीद ली। बैग से बिस्किट निकाले और उन्हें खाकर पानी पी लिया। दिमाग में अभी भी यही चल रहा था कि आखिर मुझे चक्कर कैसे आ गया। इससे पहले मैंने कभी भी (गस) चक्कर का अनुभव नहीं किया था। वहीं मन को यह भी समझा रहा था कि अब कुछ खा लिया है, इसलिए सब ठीक हो जाएगा। ट्रेन वहां से चल चुकी थी। मुझे गोरखपुर में उतरना था। वहां से मुझे काठमांडु पहुंचने का इंतजाम करना था। दरअसल, कुछ दिनों पूर्व अचानक ही पशुपतिनाथ बाबा के दर्शन करने की इच्छा जागी थी। इसके बाद मैंने कुछ मित्रों से जाने को लेकर बात की, लेकिन कोई भी चलने को राजी नहीं हुआ। इस पर मैं अकेला ही सफर पर निकल आया था।
ट्रेन अच्छी गति से चल रही थी, इसी बीच मुझे फिर वाशरूम जाने के लिए उठना हुआ। वाशरूम गया और फिर ट्रेन के गेट पर खड़े होकर हवा खाने को मन हुआ। लेकिन मन में खयाल आया कि कहीं चक्कर न आ जाए। डर के चलते पीछे हटकर पार्टीशन से पीठ लगाकर खड़ा हो गया। वहां खड़े हुए कुछ ही देर हुई थी कि जिसका डर था वही हुआ। मैं फिर अचानक गस खाकर गिर पड़ा। आंख खुली तो लोग मुझे उठाने की कोशिश कर रहे थे।
मेरी समझ नहीं आ रहा था कि आखिर मेरे साथ क्या और क्यों हो रहा है?
मेरी समझ नहीं आ रहा था कि आखिर मेरे साथ क्या और क्यों हो रहा है?
क्रमश:
(*Parts of artwork have been borrowed from the internet, with due thanks to the owner of the photograph/art)
शनिवार, 8 अप्रैल 2017
Alwar : एक अजनबी शहर का दिल की धडक़न बन जाना
आज से ठीक एक साल पहले एक अजनबी शहर अलवर में कदम रखा था। मेरे पास सिर्फ कपड़ों से ठसाठस एक बैग, एक स्लीपिंग बैग और राजस्थान पत्रिका अखबार के कार्यालय का पता था। इस शहर के इतिहास या भूगोल की कोई जानकारी तो थी नहीं, हां यह जरूर सुना था कि मेव बहुल क्षेत्र है और आपराधिक घटनाएं यहां आम हैं। पहले दिन के कुछ घंटे तो रहने और खाने की कोई माकूल व्यवस्था न होते देख तनाव में ही बीते थे। लेकिन एक दिसंबर की ही शाम होते-होते इस शहर ने आखिर मुझे पनाह दे ही दी थी। इसके बाद वात्सल्य का जो निर्झर मेरे लिए इसके हृदय से फूटा, वो आज तक मुझे सराबोर किए है।
आज अरावली पर्वत श्रंखला की गोद में बसे इस खूबसूरत शहर में एक वर्ष का सफर पूरा होने पर मैं पीछे मुडक़र देख रहा हूं। कितना कुछ मिला है इस शहर से, इसी शहर में तो मैंने अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ एक वर्ष जिया है। जिसमें 365 दिनों को मैंने जीवन के विविध रंगों में घोलकर पिया। इसके आंगन में आशा के शिखर तक चढ़ा तो निराशा के पाताल तक गोता भी लगाया।
इसके गगन में मैंने ख्वाबों की परवाज भरी है। इसकी राहों पर ही मैंने मदमस्त बेफ़िक्रा होकर घूमना सीखा है। आज यह शहर मेरे दिल की धडक़न है। हर सांस इसकी खुशबू लेकर अंदर जा रही है।
आज अरावली पर्वत श्रंखला की गोद में बसे इस खूबसूरत शहर में एक वर्ष का सफर पूरा होने पर मैं पीछे मुडक़र देख रहा हूं। कितना कुछ मिला है इस शहर से, इसी शहर में तो मैंने अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ एक वर्ष जिया है। जिसमें 365 दिनों को मैंने जीवन के विविध रंगों में घोलकर पिया। इसके आंगन में आशा के शिखर तक चढ़ा तो निराशा के पाताल तक गोता भी लगाया।
इसके गगन में मैंने ख्वाबों की परवाज भरी है। इसकी राहों पर ही मैंने मदमस्त बेफ़िक्रा होकर घूमना सीखा है। आज यह शहर मेरे दिल की धडक़न है। हर सांस इसकी खुशबू लेकर अंदर जा रही है।
शुक्रिया अलवर मुझे अपनाने का...
शुक्रिया मुझपर बेपनाह मोहब्बत लुटाने का...
शुक्रिया उन सभी हमसफरों का भी, जिन्होंने इस एक साल के सफर को सुहाना बनाने में साथ दिया।
शुक्रिया मुझपर बेपनाह मोहब्बत लुटाने का...
शुक्रिया उन सभी हमसफरों का भी, जिन्होंने इस एक साल के सफर को सुहाना बनाने में साथ दिया।
अभी तक मलाई मक्खन नहीं खाया... तो जीवन व्यर्थ है तुम्हारा
भैया जो फ़ोटू डाली हैं, इसे कहते हैं मलाई मक्खन...। कुछ ऐसा आइटम जिसे स्वर्ग के किसी व्यंजन से जोड़कर देखा जा सकता है। माने कित्ता भी खा लो पर जी नहीं भरेगा। इतना जबर स्वाद है कि हम जैसे मिठाइया तो इसे देख के ही बौरा जाते हैं।
इसी मलाई मक्खन के चक्कर में बचपन में एक दफे अमूल बटर की टिकिया ख़रीद ली। और जब हपक के बड़ी सी बाइट काट ली तो थूकते-थूकते थक गए लेकिन साली मुंह में घुसी बटर की नमकाहट न गई। तब साला पहिली दफे समझ आया कि अंग्रेजी का ईजाद सिर्फ आदमी को चूतिया (बेवकूफ) बनाने के लिए किया गया है।
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आधी जिंदगी खप जाने के बाद समझ आया कि अपने जीवन का लक्ष्य तरह-तरह के व्यंजनों का स्वाद लेना और जितनी हो सके दुनिया नाप लेना ही है। हालांकि कि कुछ मर्सडीज-बीएमडब्लू क्लास के अलावा स्प्लेंडर क्लास तक के लोग हमें चूतिया मानते हैं। उनके ऐसा मानने में कोई बुराई है नहीं। हम लोग हैं ही चूतियामेटिक। क्योंकि अपने को ख़ुशी इस चूतियापे में ही मिलती है, तो का करें...।
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खैर बात मतलब की करते हैं। ऊपर जिस आइटम की बात की है उसका स्वाद जरूर लो। एक बार ले लिया तो यह समझ लो कि यह गुलजार वाले नमक के इश्क़ की तरह ही लगेगा, जो जिंदगी भर छूटेगा नहीं। आज घर आया हूँ और हरदोई में हूँ। सुबह उठकर नित्य कर्म से निवृत होने से भी पहले मलाई मक्खन खाने निकल लिया। इस बार खा कर ही नहीं आया इस आईटम का पोस्टमॉर्टम भी कर लिया।
हरदोई में यह बड़े चौराहे पर सियाराम की दुकान के सामने मिलता है। ठेल वाले हैं भैया श्यामजी। ठेल का नाम श्यामजी मलाई मक्खन वाले। वो हरदोई वालों को करीब 20 साल से मलाई मक्खन खिला रहे हैं। इससे पहले उनके पिताजी मन्नी लालजी बगल के जिले सीतापुर में मलाई मक्खन बेचते थे।
श्यामजी से पूछा कि आखिर आपके पिता जी ये आइटम कहां से ले आए?
इस पर उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई। बोले पिता जी अपने जवानी में घर छोड़कर लखनऊ भाग गए रहे। हुंआई पहिले किसी सेठ के घर रुके लेकिन मन नहीं लगा। फिर एक हलवाई के पास रहे। वही हलवाई उन्हें सिखाई दिएस।
फिर 20 साल तक वो सीतापुर में मलाई मक्खन बेचिन फिर हरदोई आ गए। हियां हम और पिता जी दोनौ जने ठेला लगावै लगे। पिछले कुछ साल से पिता जी तो बीमार रहई लगे तो अकेले हमही लगाई रहे हैं।
श्यामजी बताएन कि मलाई मक्खन बनारस में मलैया और आगरा में दौलत की चाट के नाम से मिलता है।
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तो गुरु हरदोई में मलाई मक्खन का पता तो हमने बता दिया। कुछ दिन पहिले शहाबाद वाली Komal Rastogi जी बताई रहन कि दिल्ली में चावड़ी बाजार में अपना आइटम अवेलेबल है। आगरा की दौलत चाट और बनारस की मलैया के अलावा जहां कहीं भी जिस नाम से यह मिलता है आप बताओ। बताओ ही नहीं खाकर आओ और पैक कराकर घर वालों को भी जायका दिलाओ। जिससे कि इन चीजों को बेचने वालों की रोजी-रोटी चलती रहे।
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..और फिर हम और आप जैसे चटोरे तो इन्हीं चीजों के चलते जिन्दा हैं। ये मिलना बंद हो गईं तो सल्फाज खाकर जीवन ही समाप्त करना पड़ जाएगा।
इसी मलाई मक्खन के चक्कर में बचपन में एक दफे अमूल बटर की टिकिया ख़रीद ली। और जब हपक के बड़ी सी बाइट काट ली तो थूकते-थूकते थक गए लेकिन साली मुंह में घुसी बटर की नमकाहट न गई। तब साला पहिली दफे समझ आया कि अंग्रेजी का ईजाद सिर्फ आदमी को चूतिया (बेवकूफ) बनाने के लिए किया गया है।
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आधी जिंदगी खप जाने के बाद समझ आया कि अपने जीवन का लक्ष्य तरह-तरह के व्यंजनों का स्वाद लेना और जितनी हो सके दुनिया नाप लेना ही है। हालांकि कि कुछ मर्सडीज-बीएमडब्लू क्लास के अलावा स्प्लेंडर क्लास तक के लोग हमें चूतिया मानते हैं। उनके ऐसा मानने में कोई बुराई है नहीं। हम लोग हैं ही चूतियामेटिक। क्योंकि अपने को ख़ुशी इस चूतियापे में ही मिलती है, तो का करें...।
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खैर बात मतलब की करते हैं। ऊपर जिस आइटम की बात की है उसका स्वाद जरूर लो। एक बार ले लिया तो यह समझ लो कि यह गुलजार वाले नमक के इश्क़ की तरह ही लगेगा, जो जिंदगी भर छूटेगा नहीं। आज घर आया हूँ और हरदोई में हूँ। सुबह उठकर नित्य कर्म से निवृत होने से भी पहले मलाई मक्खन खाने निकल लिया। इस बार खा कर ही नहीं आया इस आईटम का पोस्टमॉर्टम भी कर लिया।
हरदोई में यह बड़े चौराहे पर सियाराम की दुकान के सामने मिलता है। ठेल वाले हैं भैया श्यामजी। ठेल का नाम श्यामजी मलाई मक्खन वाले। वो हरदोई वालों को करीब 20 साल से मलाई मक्खन खिला रहे हैं। इससे पहले उनके पिताजी मन्नी लालजी बगल के जिले सीतापुर में मलाई मक्खन बेचते थे।
श्यामजी से पूछा कि आखिर आपके पिता जी ये आइटम कहां से ले आए?
इस पर उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई। बोले पिता जी अपने जवानी में घर छोड़कर लखनऊ भाग गए रहे। हुंआई पहिले किसी सेठ के घर रुके लेकिन मन नहीं लगा। फिर एक हलवाई के पास रहे। वही हलवाई उन्हें सिखाई दिएस।
फिर 20 साल तक वो सीतापुर में मलाई मक्खन बेचिन फिर हरदोई आ गए। हियां हम और पिता जी दोनौ जने ठेला लगावै लगे। पिछले कुछ साल से पिता जी तो बीमार रहई लगे तो अकेले हमही लगाई रहे हैं।
श्यामजी बताएन कि मलाई मक्खन बनारस में मलैया और आगरा में दौलत की चाट के नाम से मिलता है।
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तो गुरु हरदोई में मलाई मक्खन का पता तो हमने बता दिया। कुछ दिन पहिले शहाबाद वाली Komal Rastogi जी बताई रहन कि दिल्ली में चावड़ी बाजार में अपना आइटम अवेलेबल है। आगरा की दौलत चाट और बनारस की मलैया के अलावा जहां कहीं भी जिस नाम से यह मिलता है आप बताओ। बताओ ही नहीं खाकर आओ और पैक कराकर घर वालों को भी जायका दिलाओ। जिससे कि इन चीजों को बेचने वालों की रोजी-रोटी चलती रहे।
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..और फिर हम और आप जैसे चटोरे तो इन्हीं चीजों के चलते जिन्दा हैं। ये मिलना बंद हो गईं तो सल्फाज खाकर जीवन ही समाप्त करना पड़ जाएगा।
सोचता था कि खजूर मुसलमानी आइटम है और नॉनवेज भी
ये जो कटोरी में आप रबड़ी नुमा आइटम देख रहे हैं, यह दूध में पका खजूर है। मुझे ये काफी पसंद आया, हालांकि मुझे हर मीठी चीज पसंद आती ही है। खाते तो हम इसे बचपन से आ रहे हैं। लेकिन तब दूध में बाजार से सूखे मेवे के रूप में लाया गया छुहारा होता था। कुछ साल पहले ही जाना कि खजुरिया, खजूर और छुहारा सब एक ही बिरादरी के हैं।
यहां एक बड़ी मजेदार बात साझा कर रहा हूं। अपने शहर हरदोई में बचपन में जब बाजार में ठेल पर खजूर बिकता देखता तो इससे घिन आती थी। वजह इसका उस क्षेत्र में बिकना जहां, कुछ ही दूरी पर मीट बिकता था। मैं इसके और मीट के लाल रंग को मिलाकर देखता और सोचता था कि यह भी मांसाहार वाला कोई आइटम है। क्योंकि जिस क्षेत्र में यह बिकता था वह मुस्लिम बहुल था, ऐसे में यह भी सोचता था कि यह कोई मुसलमानी आइटम है। जिससे हम हिन्दुओं का कोई लेना देना नहीं है। जबकि ये सब बातें किसी ने मुझे बताई नहीं थीं। यह सब दिमागी खर-पतवार ही था। लिहाजा सालों तक मैंने खजूर नहीं चखा।
कुछ समय पहले ही किसी ने मुझे खजूर खिलाया तो मैं इसके स्वाद से परिचित हुआ। मीठा था तो स्वाद भी जम गया। बीते शनिवार को आलू की टिक्की (भल्ला/चाट) खाने के लिए रुका। खाते-खाते बगल में ठेल पर बिकता दिख गया। एक आधा किलो का पैकेट ले लिया। अगले दिन ऑफिस गया तो एक साथी से ये बात साझा की कि भाई जिंदगी में पहली बार खजूर खरीदा है। उन्होंने मेरी तरफ घूर के देखा और दूध में डालकर इसको खाने के तमाम गुण गिना दिए। वो गुण तो अपन ने किनारे कर दिए लेकिन जायका सोचकर चहक उठा। अगले ही दिन आइटम तैयार कर लिया। आज लिखने भी आधा कटोरी चट करने के बाद बैठा हूं।
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भाई जोरदार आइटम है। अगर अब तक ट्राई न किया हो तो कर लो। वरना मरने के बाद ऊपर जवाब देते नहीं बनेगा।
...और फिर पूरे दिन उसकी चहचहाहट गूँजती रही
वह फुदकती हुई चिड़िया की तरह मेरे कमरे में आई. मुझे दो टॉफ़ी थमाई और जाने लगी. मैने पूछा, अरे बता तो दे आज है क्या... अपने आगे के टूटे दातों के बीच से साँस खीचकर बोली, मेरा हैपी बड्डे....मैने बड़ी मुश्किल से उसे रोका और शेक हैंड कर विश किया.... इतना खुश थी कि पलट कर थैंक यू की जगह मुझे भी हैप्पी बड्डे कहकर भाग गयी.
कुछ देर बाद उसके रोने और अपनी माँ से लड़ने की आवाज़ आ रही थी. कह रही थी भैया के बड्डे पर केक आई थी मेरे पर क्यों नहीं आएगी... माँ कोई जवाब नहीं दे रही थी... कुछ देर बाद उसकी माँ ने झल्लाते हुए कहा, चुप हो जा नहीं तो पीट दूँगी.
मैंने साइड से पूछ लिया. भाभी वो रो क्यों रही थी ? वो डबडबाई आँखों से बोलीं, भैया मम्मी (सास) (मेरी मकान मालकिन) को लड़कियों का जन्मदिन मनाना पसंद नहीं है.
मैं बाजार गया, चिड़िया के लिए एक कैडबरी सेलेब्रेशन लाया. लौट कर आया तो वह गली में क्रिकेट खेल रहे बच्चों के बीच कुछ उदास सी बैठी थी (शायद जवाब ढ़ूंढ रही होगी कि आख़िर मेरे लिए केक आया क्यूँ नहीं, आख़िर दादी को लड़कियों का केक काटना पसंद क्यों नहीं). मैने उसे गिफ्ट पैक थमा दिया. पलट वह कुछ नहीं बोली. मैं अपने कमरे में चला आया. अंदर उसकी आवाज़ आ रही थी. वह अपने भाई सहित एक-एक लड़के को इठलाते हुए गिफ्ट दिखा रही थी.
इसके बाद केक भूलकर पूरे दिन घर में उसकी चहचहाहट गूँजती रही.
(*Parts of artwork have been borrowed from the internet, with due thanks to the owner of the photograph/art)
कुछ देर बाद उसके रोने और अपनी माँ से लड़ने की आवाज़ आ रही थी. कह रही थी भैया के बड्डे पर केक आई थी मेरे पर क्यों नहीं आएगी... माँ कोई जवाब नहीं दे रही थी... कुछ देर बाद उसकी माँ ने झल्लाते हुए कहा, चुप हो जा नहीं तो पीट दूँगी.
मैंने साइड से पूछ लिया. भाभी वो रो क्यों रही थी ? वो डबडबाई आँखों से बोलीं, भैया मम्मी (सास) (मेरी मकान मालकिन) को लड़कियों का जन्मदिन मनाना पसंद नहीं है.
मैं बाजार गया, चिड़िया के लिए एक कैडबरी सेलेब्रेशन लाया. लौट कर आया तो वह गली में क्रिकेट खेल रहे बच्चों के बीच कुछ उदास सी बैठी थी (शायद जवाब ढ़ूंढ रही होगी कि आख़िर मेरे लिए केक आया क्यूँ नहीं, आख़िर दादी को लड़कियों का केक काटना पसंद क्यों नहीं). मैने उसे गिफ्ट पैक थमा दिया. पलट वह कुछ नहीं बोली. मैं अपने कमरे में चला आया. अंदर उसकी आवाज़ आ रही थी. वह अपने भाई सहित एक-एक लड़के को इठलाते हुए गिफ्ट दिखा रही थी.
इसके बाद केक भूलकर पूरे दिन घर में उसकी चहचहाहट गूँजती रही.
(*Parts of artwork have been borrowed from the internet, with due thanks to the owner of the photograph/art)
भगत सिंह ने यह बताया था इन्कलाब का अर्थ...
"इन्कलाब जिंदाबाद से हमारा यह उद्देश्य नहीं था, जो आम तौर पर गलत अर्थ में समझा जाता है। बम और पिस्तौल इन्कलाब नहीं लाते। बल्कि इन्कलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है। हमारे इन्कलाब का अर्थ पूंजीवाद और पूंजीवादी मुद्दों की मुसीबतों का अंत करना है।"
उक्त व्याख्या शहीद-ए-आजम भगत सिंह ने असेम्बली बम धमाके की सुनवाई के दौरान दिया था। भगत सिंह की लड़ाई मनुष्य के शोषण के खिलाफ थी। इसका जिक्र बम धमाके के बाद असेम्बली में उड़ाए पर्चों में भी था।
उनमें लिखा था कि हम मनुष्य के जीवन को पवित्र समझते हैं। हम ऐसे उज्ज्वल भविष्य में विश्वास रखते हैं, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण शान्ति और स्वतंत्रता का अवसर मिल सके। हम मानव रक्त बहाने के लिए अपनी विवशता के लिए दुखी हैं पर क्रांति द्वारा सबको समान स्वतंत्रता देने और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को समाप्त कर देने के लिए क्रांति के अवसर पर कुछ न कुछ रक्तपात अनिवार्य है।
भगत सिंह की लड़ाई मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण के खिलाफ थी। लेकिन देश में आज़ाद सवेरा आने के बाद भी हम उस दिशा में कितना आगे बढ़ सके...?
हाँ, सकारात्मक बदलाव आए हैं। लेकिन शायद दाल में नमक से भी कम। इस दिशा में हमें बहुत कुछ करने की जरूरत है। देश की 80% आबादी अभी भी दो वक़्त की रोटी के लिए जूझ रही है। हमें उनके भी हक़ की बात करनी होगी। इसके लिए हमें खुद को शोषित से शोषक में तब्दील होने से भी रोकना होगा।
इन्कलाब का अर्थ समझे बिना... इन्कलाब जिंदाबाद का नारा बुलंद करना इन बलिदानियों का अपमान होगा।
भाई भगत, राजगुरु और सुखदेव को बलिदान दिवस पर सत-सत नमन।
दुआ है हम सब भी देश और देशवासियों के प्रति प्रेम के उस भाव को महसूस कर सकेंगे। जिसमें इन वीर जियालों ने हंसते-गाते फांसी के फंदे को चूम लिया था।
शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2016
क्या खाकी को सिर्फ गाली ही दोगे... तो फिर हेमंत, मुकुल और जिया को भी गाली दो...
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सोशल मीडिया आर्मी से जुड़ी पोस्ट से भरा पड़ा है। इसी बीच आज पुलिस स्मृति दिवस आ गया। लेकिन खाकी को लेकर चुप्पी है। और जब यह चुप्पी टूटेगी तो कुछ पोस्ट दिखेंगी, जिनमें कोई पुलिसकर्मी किसी महिला को पीट रहा होगा, बैठकर रिश्वत के पैसे गिन रहा होगा या ड्यूटी के दौरान सो रहा होगा। कितनी बुरी है हमारी पुलिस। लेकिन क्या सिर्फ बुरी ही है। आप हां भी कह सकते हैं, अगर सिक्के का सिर्फ एक पहलू ही देखें।
दरअसल, हमने सिर्फ स्याह पहलू ही देखा या या यूँ कहें कि दिखाया गया। क्या कभी हमने ड्यूटी के लिए जान कुर्बान करने वाले मुम्बई में हेमंत करकरे, मथुरा में मुकुल द्विवेदी, कुण्डा में जिया उल हक़, मुरैना में नरेंद्र कुमार सिंह के बारे में सोचा है। क्या उनकी कुर्बानी शहादत नहीं है।
पुलिस के जिस सिपाही की तस्वीर ड्यूटी पर सोते हुए छपी थी। क्या आपको बताया गया कि इस ड्यूटी से पहले कितनी रातों से सोया नहीं है। क्या आपने जाना कि कब से उसने अपने बच्चे का मुंह नहीं देखा। क्या आपको पता है उसके खाना खाने का कोई समय नहीं होता। आपको सात घंटे की ड्यूटी के बाद अगर एक घंटे अधिक ऑफिस में रुकना पड़ जाए तो न जाने कितने लेबर लॉज़ का आप हवाला देते हैं लेकिन उनके लिए ड्यूटी का कोई निर्धारित समय नहीं है। 24 घंटे ड्यूटी। इसके बाद जनता के प्रतिनिधि का रौब देखने की मजबूरी सो अलग। दिनभर सिर्फ़ अपराध, अपराध और अपराध के साए में जीना होता है।
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बुराइयां हैं। हर देश में। हर समाज में। हर विभाग में। आप में और मुझमें भी। लेकिन क्या हमें उससे ऊपर नज़र उठाने की जरूरत नहीं है। अगर आप चाहते हैं कि पुलिस अच्छी हो, उसका बर्ताव अच्छा हो तो आपको अपने बर्ताव में भी छोटी-छोटी तब्दीली लानी होंगी। इसके लिए शुरुआत धूप में ट्रैफिक कंट्रोल कर रहे सिपाही को अपनी बोतल से ठंडा पानी ऑफर करने से भी हो सकती है।
सोचना होगा। गौर से देखना होगा।नहीं तो हम अनजाने में ही देश की माटी और हमारी व आपकी सुरक्षा में अपनी जिंदगी कुर्बान करने वाले सम्मान से वंचित रह जाएंगे।
अंत में उन सभी खाकी के वीर सिपाहियों को नमन, जिन्होंने खाकी और देश का इक़बाल बुलंद रखा।
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बता दें कि आज ही के दिन 21 अक्टूबर 1959 को लद्दाख सीमा पर चीनी सैनिकों के हमले में शहीद हुए सीआरपीएफ के दस जवानों की याद में हर साल पुलिस स्मृति दिवस मनाया जाता है। तब से 2015 तक करीब 34 हजार पुलिसकर्मी देश की आंतरिक सुरक्षा में शहीद हो चुके हैं।
(*Parts of artwork have been borrowed from the internet, with due thanks to the owner of the photograph/art)
(*Parts of artwork have been borrowed from the internet, with due thanks to the owner of the photograph/art)
रविवार, 16 अक्टूबर 2016
ये नाकारा बच्चे हैं...
कल पेरेंट्स-टीचर्स मीटिंग में स्कूल जाना हुआ। उसी स्कूल में जहाँ से मैंने नवीं से बारहवीं तक की पढ़ाई की। और एक नाकारा स्टूडेंट के रूप में पासआउट हुआ।
ये पहला मौका था इस तरह की मीटिंग में जाने का।गजब माहौल था। बच्चों के पिता तो कम माताएं ही अधिकतर आई थी। पिताओं के पास फीस चुकाने के अलावा किसी और भागीदारी का समय ही कहाँ लेकिन बेटा/बेटी अधिकारी से कम न बने।
चलिए आगे के खुशनुमा नाजरे देखिये- माताओं के मीटिंग हॉल में घुसते ही महिला शिक्षकों का झुंड यह सिद्ध करने में जुटा है कि जिस बच्चे के साथ वो आई हैं वह दुनिया का सबसे नाकारा बच्चा है। वह सिर्फ अवगुणों से भरा है।
- उसका वर्क कभी पूरा नहीं रहता
- क्लास में कभी जवाब नहीं देता
- ऊटपटांग सवाल करता है
- उसकी शैतानियाँ बर्दास्त के बाहर हैं
- फ्रेंडशिप गंदे बच्चों से है
- बात करने का तरीका बहुत गंदा है...ब्ला...ब्ला...ब्ला।
इन सब उलाहनों के बीच बच्चों से टूटी फूटी अंगरेजी में बात। ताकि साथ आई माँ डर जाएं और मैडम से हिंदी में कोई सवाल न कर सकें। बात जी जी जी...तक रह जाए। अरे मैडम ये मीटिंग क्या सिर्फ उलाहना देने के लिए बुलाई थी। इस पर भी कुछ बात कर लेते कि बच्चे में अगर कोई कमजोरी है तो कैसे उसकी मदद की जाए।
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एक और नजारा- एक मैथ्स के शिक्षक, जिन्होंने मुझे भी पढ़ाया। प्रवचन दे रहे थे, मुझे 16 साल पढ़ाने का अनुभव है। मुझे क्लास के हर बच्चे का लेवल पता है। आपकी लड़की एवरेज है पर आगे जा सकती है अगर मेहनत करे। अरे क्लास के कुछ बच्चे तो बहुत टैलेंटेड हैं। उस लड़की का क्या नाम है...हाँ कम हाइट वाली। हां... बहनजी अगर वो लड़की न आए तो क्लास में पढ़ाने में मजा ही नहीं आता। क्या दिमाग है उसका। सवाल बोर्ड पे लिखा नहीं की फट से सॉल्व।
...अरे गुरु घंटाल...फिर तुम उसे क्या पढ़ा और सिखा रहे हो। वो तो खुद ही टैलेंटेड है। अगर ये एवरेज और वीक वाली ऐसा कर दिखाएँ तो सीना चौड़ा करो। इनको सिखाने में मजा क्यों नहीं लेते...मजा...!
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वैसे यह कहानी अधिकतर संस्थानों की है। सारा ध्यान उन बच्चों पर है जो तेज हैं न कि कमजोर को सपोर्ट करने में। कारण, बोर्ड एग्जाम मेरिट में सिर्फ वही इनका सिर ऊंचा करेंगे। एवरेज और कमजोर वाले तो नाकारा हैं...नाकारा।
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हालाँकि एक कोने में बैठा बुड्ढा इतिहास कुछ और ही कह रहा है... वो कहता है, जिन्हें इन सो कॉल्ड शिक्षकों ने नाकारा घोषित कर दिया। वो बच्चे सफलता के फलक पर तारा बनकर चमके हैं। उनके आविष्कारों ने दुनिया को राह दिखाई है।
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ऐसा है क्या...। मतलब वो E= mc2 वाला भी नाकारा था क्या। अच्छा तो वो हवाई जहाज वाले दोनों भाई। अरे वो जिसके सिर पर सेब गिरा था। और वो बल्ब वाला। अच्छा और भी बहुत सारे आविष्कार और खोज करने वाले ऐसे ही हैं।
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नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता। स्कूल में तो हमें ऐसा नहीं बताया गया। सर और मैम तो कहते थे वो सब बहुत महान थे।
(*Parts of artwork have been borrowed from the internet, with due thanks to the owner of the photograph/art)
ये पहला मौका था इस तरह की मीटिंग में जाने का।गजब माहौल था। बच्चों के पिता तो कम माताएं ही अधिकतर आई थी। पिताओं के पास फीस चुकाने के अलावा किसी और भागीदारी का समय ही कहाँ लेकिन बेटा/बेटी अधिकारी से कम न बने।
चलिए आगे के खुशनुमा नाजरे देखिये- माताओं के मीटिंग हॉल में घुसते ही महिला शिक्षकों का झुंड यह सिद्ध करने में जुटा है कि जिस बच्चे के साथ वो आई हैं वह दुनिया का सबसे नाकारा बच्चा है। वह सिर्फ अवगुणों से भरा है।
- उसका वर्क कभी पूरा नहीं रहता
- क्लास में कभी जवाब नहीं देता
- ऊटपटांग सवाल करता है
- उसकी शैतानियाँ बर्दास्त के बाहर हैं
- फ्रेंडशिप गंदे बच्चों से है
- बात करने का तरीका बहुत गंदा है...ब्ला...ब्ला...ब्ला।
इन सब उलाहनों के बीच बच्चों से टूटी फूटी अंगरेजी में बात। ताकि साथ आई माँ डर जाएं और मैडम से हिंदी में कोई सवाल न कर सकें। बात जी जी जी...तक रह जाए। अरे मैडम ये मीटिंग क्या सिर्फ उलाहना देने के लिए बुलाई थी। इस पर भी कुछ बात कर लेते कि बच्चे में अगर कोई कमजोरी है तो कैसे उसकी मदद की जाए।
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एक और नजारा- एक मैथ्स के शिक्षक, जिन्होंने मुझे भी पढ़ाया। प्रवचन दे रहे थे, मुझे 16 साल पढ़ाने का अनुभव है। मुझे क्लास के हर बच्चे का लेवल पता है। आपकी लड़की एवरेज है पर आगे जा सकती है अगर मेहनत करे। अरे क्लास के कुछ बच्चे तो बहुत टैलेंटेड हैं। उस लड़की का क्या नाम है...हाँ कम हाइट वाली। हां... बहनजी अगर वो लड़की न आए तो क्लास में पढ़ाने में मजा ही नहीं आता। क्या दिमाग है उसका। सवाल बोर्ड पे लिखा नहीं की फट से सॉल्व।
...अरे गुरु घंटाल...फिर तुम उसे क्या पढ़ा और सिखा रहे हो। वो तो खुद ही टैलेंटेड है। अगर ये एवरेज और वीक वाली ऐसा कर दिखाएँ तो सीना चौड़ा करो। इनको सिखाने में मजा क्यों नहीं लेते...मजा...!
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वैसे यह कहानी अधिकतर संस्थानों की है। सारा ध्यान उन बच्चों पर है जो तेज हैं न कि कमजोर को सपोर्ट करने में। कारण, बोर्ड एग्जाम मेरिट में सिर्फ वही इनका सिर ऊंचा करेंगे। एवरेज और कमजोर वाले तो नाकारा हैं...नाकारा।
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हालाँकि एक कोने में बैठा बुड्ढा इतिहास कुछ और ही कह रहा है... वो कहता है, जिन्हें इन सो कॉल्ड शिक्षकों ने नाकारा घोषित कर दिया। वो बच्चे सफलता के फलक पर तारा बनकर चमके हैं। उनके आविष्कारों ने दुनिया को राह दिखाई है।
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ऐसा है क्या...। मतलब वो E= mc2 वाला भी नाकारा था क्या। अच्छा तो वो हवाई जहाज वाले दोनों भाई। अरे वो जिसके सिर पर सेब गिरा था। और वो बल्ब वाला। अच्छा और भी बहुत सारे आविष्कार और खोज करने वाले ऐसे ही हैं।
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नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता। स्कूल में तो हमें ऐसा नहीं बताया गया। सर और मैम तो कहते थे वो सब बहुत महान थे।
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किसी स्त्री का मर्जी से किसी के साथ सोना हैरान करता है गैंगरेप नहीं
गैंगरेप के बाद युवती की हत्या, मासूम के साथ उसके चाचा द्वारा बलात्कार कर उसकी हत्या। उक्त दोनों घटनाओं से जनपद या यूं कहें समाज या यूं कहें मनवता शर्मशार है। ऐसा अखबार और न्यूज चैनल बता रहे हैं। मगर शर्म महसूस हो रही है या नहीं यह कहना थोड़ा मुश्किल है। खैर न भी हो तो क्या फर्क पड़ता है। सिर्फ शर्म कौन सी क्रांति ले आएगी।
वहीं एक फोटो अखबार में देखी, पूर्वी यूपी के किसी जिले में एक महिला को घर से बाहर बैलगाड़ी में उसके पति ने बांध कर रखा है और रोज पीटता है। मामला पति के प्रेम संबंधों के विरोध का बताया गया। इधर, इंडिया टुडे का पिछला अंक नेपाल की गुमशुदा बेटियों का दर्द बयां करने की कोशिश कर रहा है। जो लखनऊ से लेकर जीबी रोड के कोठा नंबर 64 तक में ठूंस दी गई हैं।
चारों घटनाओं को अलग-अलग नजरिये से देखा और लिखा गया। मगर कोई भी इन्हें पढ़ या देख कर कुछ पलों से ज्यादा के लिए हैरान नहीं हुआ है, यहां तक मैं भी नहीं। हो भी क्यों, ऐसा कौन सा दिन होता है जिस दिन ऐसी घटनाएं नहीं होतीं। मुझे तो लगता है कुछ समय बाद ये घटनाएं न्यूज भी नहीं बनेंगी। कारण, न्यूज की परिभाषा ही यही कहती है कि जो नया और लोगों के लिए मनोरंजक है वही न्यूज है।अब और नया होने को रह ही क्या गया है।
भाई, देखो बाप बेटी का सौदा तो सालों साल से करता आ रहा है। अब रेप भी करने लगा है। इसमें बुराई ही क्या है। जब बेटी कोठे पर बैठेगी तो साला सैंकड़ों लोग उसके शरीर को मसलेंगे अगर बाप घर में उसे मसल रहा है तो प्रताणना कम ही समझो। अब जब बाप ऐसा कर सकता है तो चाचा, पड़ोसी और गांव का कोई व्यक्ति ऐसा कर दे तो कोई बहुत बड़ा दोष थोड़ी ही है। भाई, स्त्री तो भोग के लिए ही बनी है। जमकर भोगो। और मौका मिले तो आगे बढ़कर सांत्वना भी देने से न चूको..." अरे ये तो बहुत बुरा हुआ बेचारी के साथ ".... लेकिन मौका पाते ही तुम भी वही करो जिसके लिए सांत्वना देने गए थे। अब कोई और सांत्वना देने का मौका लपक ही लेगा।
हां, एक परिस्थिति है जहां सारी परिभाषाएं, सारी मान्यताएं उलट जाती हैं। पूरा समाज सच में शर्मशार महसूस करता है। हर किसी के दिल में सांत्वना की जगह गुस्से के गुबार उठने लगते हैं। जब भोग के लिए बनी यह स्त्री अपनी मर्जी से किसी को अपना जिश्म सौंप दे या शादी के बंधन में बंधने के लिए मजबूर होकर भाग जए। यह तो पाप है महापाप। छी… सभी को घिन आने लगती है उससे, है ना। अरे भाग न भी गई हो महज मुस्कुरा कर किसी से बात भी कर ले तो समझिए सारी मर्यादाएं तार-तार हो गईं। मानों एक मछली ने सारा तलाब गंदा कर दिया हो। सभी बदबू से कराह उठते हैं। कमाल है भाई। धन्य है समाज। धन्य हैं मर्यादाएं। धन्य है समाजी। जिंदाबाद जिंदाबाद।
चारों घटनाओं को अलग-अलग नजरिये से देखा और लिखा गया। मगर कोई भी इन्हें पढ़ या देख कर कुछ पलों से ज्यादा के लिए हैरान नहीं हुआ है, यहां तक मैं भी नहीं। हो भी क्यों, ऐसा कौन सा दिन होता है जिस दिन ऐसी घटनाएं नहीं होतीं। मुझे तो लगता है कुछ समय बाद ये घटनाएं न्यूज भी नहीं बनेंगी। कारण, न्यूज की परिभाषा ही यही कहती है कि जो नया और लोगों के लिए मनोरंजक है वही न्यूज है।अब और नया होने को रह ही क्या गया है।
भाई, देखो बाप बेटी का सौदा तो सालों साल से करता आ रहा है। अब रेप भी करने लगा है। इसमें बुराई ही क्या है। जब बेटी कोठे पर बैठेगी तो साला सैंकड़ों लोग उसके शरीर को मसलेंगे अगर बाप घर में उसे मसल रहा है तो प्रताणना कम ही समझो। अब जब बाप ऐसा कर सकता है तो चाचा, पड़ोसी और गांव का कोई व्यक्ति ऐसा कर दे तो कोई बहुत बड़ा दोष थोड़ी ही है। भाई, स्त्री तो भोग के लिए ही बनी है। जमकर भोगो। और मौका मिले तो आगे बढ़कर सांत्वना भी देने से न चूको..." अरे ये तो बहुत बुरा हुआ बेचारी के साथ ".... लेकिन मौका पाते ही तुम भी वही करो जिसके लिए सांत्वना देने गए थे। अब कोई और सांत्वना देने का मौका लपक ही लेगा।
हां, एक परिस्थिति है जहां सारी परिभाषाएं, सारी मान्यताएं उलट जाती हैं। पूरा समाज सच में शर्मशार महसूस करता है। हर किसी के दिल में सांत्वना की जगह गुस्से के गुबार उठने लगते हैं। जब भोग के लिए बनी यह स्त्री अपनी मर्जी से किसी को अपना जिश्म सौंप दे या शादी के बंधन में बंधने के लिए मजबूर होकर भाग जए। यह तो पाप है महापाप। छी… सभी को घिन आने लगती है उससे, है ना। अरे भाग न भी गई हो महज मुस्कुरा कर किसी से बात भी कर ले तो समझिए सारी मर्यादाएं तार-तार हो गईं। मानों एक मछली ने सारा तलाब गंदा कर दिया हो। सभी बदबू से कराह उठते हैं। कमाल है भाई। धन्य है समाज। धन्य हैं मर्यादाएं। धन्य है समाजी। जिंदाबाद जिंदाबाद।
नोट- उक्त समस्या के कई अन्य महत्वपूर्ण पहलू भी हैं।
(*Parts of artwork have been borrowed from the internet, with due thanks to the owner of the photograph/art)
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मातृत्व के ये भी मायने...
महिलाओं को दिया गया मातृत्व का वरदान परिस्थितियों के साथ अभिषाप भी साबित होता है। हमारी समाजिक कुंठित कर देने वाली व्यवस्था में बच्चे को गर्भ में नौ महीने रखना, प्रसवपीड़ा को बर्दास्त करना और उसका पालन-पोषण करना महिला की मजबूरी है। इसमें पुरुष का योगदान अर्थिक सहयोग तक सीमित है और कहीं-कहीं तो वह भी नहीं।
काश र्इश्वर कोर्इ ऐसी व्यवस्था बनाता जिसमें पुरुष के मंसूबे बुरे होने पर महिला गर्भवती ही न होती। या फिर बच्चा साढ़े चार-चार महीने दोनों के गर्भ में पलता। मैं र्इश्वर में विश्वास रखता हूं और उसकी बनार्इ हर व्यवस्था में भी लेकिन फिर भी कर्इ बार मुझे ऐसा महसूस होता है कि महिलाओंं के साथ न्याय नहीं हुआ। उसकी संरचना भावनात्मक रूप से तो पुष्प से भी ज्यादा कोमल कर दी गर्इ लेकिन सामना करने के लिए परिस्थितियां पत्थर से भी कठोर और कांटों से भी ज्यादा नुकीली दी गर्इं।
यह तो सिर्फ विवाहित महिलाओं की दुश्वारियां हैं। सोचिये, अविवाहित महिला के लिए मातृत्व के कितने भयावाह मायने हैं। हर एक कदम फूंक-फूंक कर रखने को विवश है। सामाजिक कीचड़ में उसका जरा सा पैर फिसला नहीं कि लांछनों के गर्म तेल के कढ़ाहे उस पर उड़ेल दिए जाते हैं। फिर पूरी जिंदगी उसे इन फफोलों के साथ ही जीनी नहीं काटनी होती है।
नोट- यहां महानगरों की उन नारियों को फिलहाल अपवाद ही माना जा सकता है, जो देर रात तक काल सेंटरों में नौकरी करने, ब्वायफ्रैंड के साथ घूमने-फिरने को आजाद हैं। अनवांटेड-72 जैसी पिल्स उनकी पहुंच में हैं। शादी के बाद बच्चा कब पैदा करना है, अगर दो पैदा करने हैं तो उनमें कितना गैप रखना है इस पर पति से बहस भी कर लेती हैं।
यहां तो बात उनकी हो रही है जिन्हें कालेज गांव से दो किलोमीटर दूर होने की वजह से ही पांचवीं के बाद पढ़ार्इ से त्यागपत्र देना पड़ जाता है। कोर्इ लड़का अगर उसके चक्कर काटने लगे तो घर में लड़की को ही पिटार्इ कर तालों में जकड़ दिया जाता है। शादी किससे होगी, इसके बाद बच्चे कितने पैदा करने हैं इसपर भी उनका कोई जोर नहीं होता।
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काश र्इश्वर कोर्इ ऐसी व्यवस्था बनाता जिसमें पुरुष के मंसूबे बुरे होने पर महिला गर्भवती ही न होती। या फिर बच्चा साढ़े चार-चार महीने दोनों के गर्भ में पलता। मैं र्इश्वर में विश्वास रखता हूं और उसकी बनार्इ हर व्यवस्था में भी लेकिन फिर भी कर्इ बार मुझे ऐसा महसूस होता है कि महिलाओंं के साथ न्याय नहीं हुआ। उसकी संरचना भावनात्मक रूप से तो पुष्प से भी ज्यादा कोमल कर दी गर्इ लेकिन सामना करने के लिए परिस्थितियां पत्थर से भी कठोर और कांटों से भी ज्यादा नुकीली दी गर्इं।
यह तो सिर्फ विवाहित महिलाओं की दुश्वारियां हैं। सोचिये, अविवाहित महिला के लिए मातृत्व के कितने भयावाह मायने हैं। हर एक कदम फूंक-फूंक कर रखने को विवश है। सामाजिक कीचड़ में उसका जरा सा पैर फिसला नहीं कि लांछनों के गर्म तेल के कढ़ाहे उस पर उड़ेल दिए जाते हैं। फिर पूरी जिंदगी उसे इन फफोलों के साथ ही जीनी नहीं काटनी होती है।
नोट- यहां महानगरों की उन नारियों को फिलहाल अपवाद ही माना जा सकता है, जो देर रात तक काल सेंटरों में नौकरी करने, ब्वायफ्रैंड के साथ घूमने-फिरने को आजाद हैं। अनवांटेड-72 जैसी पिल्स उनकी पहुंच में हैं। शादी के बाद बच्चा कब पैदा करना है, अगर दो पैदा करने हैं तो उनमें कितना गैप रखना है इस पर पति से बहस भी कर लेती हैं।
यहां तो बात उनकी हो रही है जिन्हें कालेज गांव से दो किलोमीटर दूर होने की वजह से ही पांचवीं के बाद पढ़ार्इ से त्यागपत्र देना पड़ जाता है। कोर्इ लड़का अगर उसके चक्कर काटने लगे तो घर में लड़की को ही पिटार्इ कर तालों में जकड़ दिया जाता है। शादी किससे होगी, इसके बाद बच्चे कितने पैदा करने हैं इसपर भी उनका कोई जोर नहीं होता।
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Sankisa...एक कदम बुद्धि की ओर.…
हाल ही में उत्तर प्रदेश के फर्रूखाबाद जिले में स्थित संकिसा जाना हुआ। यह स्थान बौद्ध धर्म से जुड़ा है। मान्यता है कि यहां तथागत यानी गौतम बुद्ध ने अपनी मौसी गौतमी को स्वर्ग से आकर उपदेश दिया था। मैं संकिसा बतौर जिज्ञासु गया लेकिन स्थल की हालत और कुछ ढोंगियों की उपस्थिति ने भीतर का पत्रकार जगा दिया। एक अच्छी स्टोरी लिखने के लिए पर्याप्त साक्ष्य भी एकत्रित हो गए। एक पत्रकार तो संतुष्ट होकर लौटने को तैयार था लेकिन एक जिज्ञासु हताश था। हालाँकि अब भी उसे उम्मीद थी कि गौतम किसी ऐसे के पास ले जायेंगे जो उसकी पिपासा को शांत कर सकेगा और कहेगा बुद्धम् शरणम् गच्छामि..बुद्ध की शरण में चलो। मैं संतुष्टि और असंतुष्टि के भाव के बीच झूल रहा था.…फिर लौटने का फैसला किया लेकिन कुछ ही दूर आने के बाद मन में आया कि मुझे एक बार फिर वापस जाना है। बाइक वापस मोड़ दी लेकिन इस बार उस स्थान पर रुकना नहीं हुआ जहां तथागत स्वर्ग से लौटकर आये थे। मैं उससे एक किलोमीटर और आगे चला गया। मैं कुछ विदेशी मंदिर और साधना स्थल पहले ही देख चुका था, इस बार एक भारतीय मंदिर के आगे रुका जिसे मैनपुरी के किसी भिक्षु ने बनवाया था। अंदर गया तो एक बुजुर्ग भिक्षु मिले उन्होंने मुस्कान के साथ स्वागत किया। पहली बार कुछ सकारात्मक अनुभूति हुई। इसके बाद उनसे कुछ जानने-समझने बैठ गया। लेकिन कुछ देर बुद्ध के सिद्धांत बताने के बाद वो हिन्दू मान्यताओं और पाखंडों पर चोट करने लगे, इसी बीच दो अन्य भिक्षुओं का भी आगमन हुआ। वे दोनों देखने में विदेशी लगे (हालाँकि वो हमारे त्रिपुरा राज्य के थे)। कुछ देर बुजुर्ग भिक्षु को सुनने के बाद एक भिक्षु ने हस्तक्षेप किया। उसने हिन्दू धर्म की कुछ मान्यताओं का बेवजह खंडन करने पर बुजुर्ग भिक्षु को आड़े हाथ लिया। इसके बाद जो कुछ भी उसने कहा मैं डूबकर सुनता रहा। मुझे लगा गौतम ने आखिर मुझे एक सच्चे बौद्ध भिक्षु से मिला दिया है। इसके बाद उस युवा भिक्षु के साथ चर्चा शुरू हो गई । एक जिज्ञासु का चेहरा संतोष के भाव से खिलता जा रहा था। बौद्ध धर्म से लेकर दर्शन, देश-दुनिया के कई मुद्दों पर हमने खुलकर बात की। उसके पास से उठने का मन तो नहीं था लेकिन समय के अभाव ने विवश कर दिया।
बतौर जिज्ञासु मेरे पास लिखने को बहुत कुछ है। बतौर पत्रकार लिखने को बहुत कुछ है। लेकिन अब बहुत कुछ लिखने का मन नहीं कर रहा। अंत में ही सही गौतम इस जिज्ञासु को ज्ञान के एक ऐसे झरने के पास ले गए थे जो इसकी पिपासा को शांत कर सकता था लेकिन उसने शांत करने की जगह पिपासा और बढ़ा दी। उसने अंत में यह भी कहा कि बुद्धम् शरणम् गच्छामि...लेकिन अर्थ बदल चुका था उसने बुद्ध की शरण में नहीं बुद्धि की शरण में जाने को कहा। सच भी यही है, बुद्ध अपनी शरण में आने को कैसे कह सकते हैं, जब वो खुद किसी की शरण में नहीं गए।
Gandhi and Godse
I am prepared to concede that Gandhiji undergo suffering for the shake of nation. I shall bow in respect to the service and to him. But even this servant of the country had no right to vivisect the country by deceiving the people.
-Nathuram Godse
इन दिनों व्हाइ आइ एसेसिनेटेड गांधी पुस्तक पढ़ रहा हूं। इसमें नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या की एक नहीं पूरी 150 वजह बताई हैं। पुस्तक को पढ़कर लगता है कि नाथूराम कोई सड़क छाप या सिरफिरा आदमी तो एकदम नहीं था। वह खुद को राष्ट्र भक्त समझता था, लेकिन हिंदू राष्ट्र भक्त। एक व्यक्ति के रूप में वह गांधीजी का बहुत सम्मान भी करता था। यही वजह है कि पूरी पुस्तक में हर जगह संबोधन गांधीजी कहकर ही किया गया है।
यहाँ सवाल ज़रूर उठता है कि एक सुलझे और समझदार आदमी के अंदर अमानवीय बीज कैसे बो दिए गये।... तो इसके मूल में भी तथाकथित धर्म ही मिलता है. इन तथाकथित धर्मों ने धर्म और अधर्म की ऐसी जटिल और व्यर्थ परिभाषाएँ गढ़ी कि मनुष्य इसे समझने के फेर में अपना मूल धर्म खो बैठा।
इसी की बानगी हिंदुओं का सर्वश्रेष्ठ धार्मिक साहित्य महाभारत है। इसमें धर्म और अधर्म का युद्ध भी मानवता की लाश पर ही हुआ था। अगर गांधी जी जैसा अहिंसा का पुजारी महाभारत का कोई पात्र होता तो वहां भी उस पात्र का अंत ऐसा ही होता, जैसा बिरला हाउस में हुआ। गांधीजी जैसा पात्र किसी बड़े धर्म में आप फिट नहीं बैठा सकते। कहीं जीजस तो कहीं पैगंबर का अंत करने के लिए बढ़ने वाले पहले गांधीजी का अंत करेंगे। यही नहीं कुछ पैगंबर की रक्षा के नाम पर भी गाँधी का सिर कलम कर देंगें।
गोडसे ने जो किया कहीं न कहीं यह विष हमारे धर्म ग्रंथों से ही निकलकर बाहर आया है। जबकि इन ग्रंथों को लिखने वालों ने तो कोशिश मीठा शहद बाँटने की की थी लेकिन इसकी व्याख्या करने वालों ने इसमें मतलब का चूना भी मिला दिया। और लोगों को धार्मिक विष हाथ लगा। गांधीजी के दौर में किसी को महावीर या बुद्ध के रूप में स्वीकार किया जाना संभव नहीं था। नहीं तो गांधी भी आज एक धर्म के रूप में जाने जाते।
अब देखिए बात गांधीजी की हत्या से शुरू की थी और पहुंच धर्म पर गई। दरअसल उनकी हत्या के मूल में तथाकथित धर्म ही तो है। पाकिस्तान बनने के पीछे तथाकथित धर्म है, इसके बाद गोडसे द्वारा उठाए गए कदम के पीछे तथाकथित धर्म है। और अफसोस इस बात का ही है कि हमने अब भी मूल धर्म को समझा नहीं। गौतम और महावीर ने अपना जीवन खपा दिया सिर्फ धर्म को समझाने में। लेकिन लोगों ने धर्म तो समझा नहीं दो नये धर्म ही बना डाले।
खैर धर्म अनंत धर्म कथा अनंता...
बापू की पुण्यतिथि पर उन्हें सादर नमन। बापू अफ़सोस आपको आज तक समझा ही नहीं गया। काश आप भी मनवता का अर्थ समझाने की जगह लोगों को एक नए धर्म की अफीम देकर गए होते। सच कहता हूँ असाराम के दौर में लाखों लोग धार्मिक नशे में धुत होकर झूम रहे होते।...
हालाँकि कुछ गाँधी भवनों में आज भी नित्य श्रद्धा की बाती प्रज्ज्वलित की जा रही है। उनका प्रिय भजन रघुपति राघव राजा राम गूँज रहा है....लव यू बापू।
(*Parts of artwork have been borrowed from the internet, with due thanks to the owner of the photograph/art)
-Nathuram Godse
इन दिनों व्हाइ आइ एसेसिनेटेड गांधी पुस्तक पढ़ रहा हूं। इसमें नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या की एक नहीं पूरी 150 वजह बताई हैं। पुस्तक को पढ़कर लगता है कि नाथूराम कोई सड़क छाप या सिरफिरा आदमी तो एकदम नहीं था। वह खुद को राष्ट्र भक्त समझता था, लेकिन हिंदू राष्ट्र भक्त। एक व्यक्ति के रूप में वह गांधीजी का बहुत सम्मान भी करता था। यही वजह है कि पूरी पुस्तक में हर जगह संबोधन गांधीजी कहकर ही किया गया है।
यहाँ सवाल ज़रूर उठता है कि एक सुलझे और समझदार आदमी के अंदर अमानवीय बीज कैसे बो दिए गये।... तो इसके मूल में भी तथाकथित धर्म ही मिलता है. इन तथाकथित धर्मों ने धर्म और अधर्म की ऐसी जटिल और व्यर्थ परिभाषाएँ गढ़ी कि मनुष्य इसे समझने के फेर में अपना मूल धर्म खो बैठा।
इसी की बानगी हिंदुओं का सर्वश्रेष्ठ धार्मिक साहित्य महाभारत है। इसमें धर्म और अधर्म का युद्ध भी मानवता की लाश पर ही हुआ था। अगर गांधी जी जैसा अहिंसा का पुजारी महाभारत का कोई पात्र होता तो वहां भी उस पात्र का अंत ऐसा ही होता, जैसा बिरला हाउस में हुआ। गांधीजी जैसा पात्र किसी बड़े धर्म में आप फिट नहीं बैठा सकते। कहीं जीजस तो कहीं पैगंबर का अंत करने के लिए बढ़ने वाले पहले गांधीजी का अंत करेंगे। यही नहीं कुछ पैगंबर की रक्षा के नाम पर भी गाँधी का सिर कलम कर देंगें।
गोडसे ने जो किया कहीं न कहीं यह विष हमारे धर्म ग्रंथों से ही निकलकर बाहर आया है। जबकि इन ग्रंथों को लिखने वालों ने तो कोशिश मीठा शहद बाँटने की की थी लेकिन इसकी व्याख्या करने वालों ने इसमें मतलब का चूना भी मिला दिया। और लोगों को धार्मिक विष हाथ लगा। गांधीजी के दौर में किसी को महावीर या बुद्ध के रूप में स्वीकार किया जाना संभव नहीं था। नहीं तो गांधी भी आज एक धर्म के रूप में जाने जाते।
अब देखिए बात गांधीजी की हत्या से शुरू की थी और पहुंच धर्म पर गई। दरअसल उनकी हत्या के मूल में तथाकथित धर्म ही तो है। पाकिस्तान बनने के पीछे तथाकथित धर्म है, इसके बाद गोडसे द्वारा उठाए गए कदम के पीछे तथाकथित धर्म है। और अफसोस इस बात का ही है कि हमने अब भी मूल धर्म को समझा नहीं। गौतम और महावीर ने अपना जीवन खपा दिया सिर्फ धर्म को समझाने में। लेकिन लोगों ने धर्म तो समझा नहीं दो नये धर्म ही बना डाले।
खैर धर्म अनंत धर्म कथा अनंता...
बापू की पुण्यतिथि पर उन्हें सादर नमन। बापू अफ़सोस आपको आज तक समझा ही नहीं गया। काश आप भी मनवता का अर्थ समझाने की जगह लोगों को एक नए धर्म की अफीम देकर गए होते। सच कहता हूँ असाराम के दौर में लाखों लोग धार्मिक नशे में धुत होकर झूम रहे होते।...
हालाँकि कुछ गाँधी भवनों में आज भी नित्य श्रद्धा की बाती प्रज्ज्वलित की जा रही है। उनका प्रिय भजन रघुपति राघव राजा राम गूँज रहा है....लव यू बापू।
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अगर उम्मीद से दुनिया कायम है तो, इसका थोपा जाना 'दुनिया' का अंत भी है...
कभी-कभी हमारे इर्द-गिर्द ऐसा भी घटता है जिसे लिखे बिना रहा नहीं जाता. लिखने के पीछे का उद्देश्या कोई संदेश देना नहीं, बस घटना से अंदर पनपे आक्रोश से फटते माथे को ठंडा कर देने की कोशिश मात्र होती है. आज फिर कुछ ऐसा ही घटा है, जो आँखों को गीला और रूह को झुलसा गया है.
खबर उत्तर प्रदेश की राजधानी से, यहाँ जिंदगी मौत से हारी है. एक छात्र ने बड़ी माँ की साड़ीको फंदा बनाकर, खुद को दुनियाँ में लाए जाने के फ़ैसले को ग़लत साबित कर दिया है. हालाँकि उस मासूम ने इसके लिए ज़िम्मेदार कॉलेज के एचओडी को ठहराया है...और उम्मीदों को पूरा न कर पाने के लिए पिता से माफ़ी मांगी....
आप का अपना नज़रिया होगा...होना भी चाहिए...
लेकिन मुझे नहीं लगता किसी की प्रताड़ना शक्ति के उस पुंज को आत्माहत्या के लिए विवश कर सकती है. प्रताडित करने वाले से लड़ने में वह सक्षम होगा, लेकिन लड़ इस लिए नहीं पाया क्योंकि उसके कंधों पर उम्मीदों का बोझ था. उसे डर लड़ाई हारने का नहीं, इन उम्मीदों के बिखर जाने का था. ये उम्मीदें, उसने खुद कंधों पर नहीं उठाईं थी, आप ने उसके कंधों पर लाद कर घर से भेजा था उसे. जब भी वह कॉलेज के दबाव से मन हल्का करने के लिए घर आता, आप उम्मीदों का बोझ थोड़ा और बढ़ा देते.
अब आप इसे मेरी कोरी कल्पना करार देने की कोशिश ना करिएगा क्योंकि इन उम्मीदों को ढोने की कोशिश मैं कर चुका हूँ. अपने दोस्तों, भाइयों और जिंदगी में टकराए न जाने कितने लोगों को झुके कंधों से इन उम्मीदों को ढोते देखा है मैने.
लेकिन मैं जानना चाहता हूँ आप सब ऐसा क्यों करते हैं. क्या पौधे कि मजबूरी है कि अगर आपने समय से उसे खाद और पानी दिया है तो वह आप को पुष्प और फल दे ही. क्या आप उसे आज़ाद नहीं छोड़ सकते जैसे जंगलों में उगने वाले पेड़ और पौधे आज़ाद होते हैं. उन्हें भी तो कोई खाद और पानी देता ही है ना. आप सब क्यों घर का सूनापन दूर करने, परिवार की ज़रूरत, सामाजिकता, बुढ़ापे की लाठी बनाने के लिए एक जीवन का सृजन कर बैठते हैं. क्या इस सृजन को भी आप फैक्टरी में तैयार उत्पाद के रूप में ही देखते हैं, जो आप की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए बनाया गया है.
मुझे पता है, आप उसे बेइंतेहा प्यार करते हैं, उसपर अपनी जिंदगी न्योछावर करने को तैयार हैं. उसकी आँखों से निकले एक आँसू के लिए आप दुनिया से लड़ जाने को तैयार हैं. फिर क्यों आप अपनी उम्मीदों को उसके गले का फंदा बनते नहीं देख पाते.
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अगर आप बिना किसी उम्मीद के ही पौधे को खाद और पानी देने में खुशी ढूढ़ लें तो इसी पौधे का पुष्प आपको आनंदित कर देगा, उसकी खुशबू आप के रोम रोम को खिला देगी (और फिर गीता में कृष्ण भी तो यही कहते हैं... मेरी नहीं तो उन्ही की मान लीजिए).
परमपिता की बगिया में अनंत प्रकार के फूल हर सुबह खिलते हैं. कोई अपनी खुशबू तो कोई सौंदर्य से अपनी पहचान बनाता है. आप इन फूलों को स्वच्छन्द भाव से खिलने दो. इनका मुकाम सिर्फ़ आपकी बालकनी नहीं पूरी दुनिया को महकाना है. आप तो माली की भूमिका को स्वीकार करो. और ईश्वर द्वारे बनाए इस रंगमंच में अपने किरदार को खुलकर जी लो...यही जीवन है...
इसी में सारा आनंद...परमानंद... स्वर्ग...जन्नत...मोक्ष सब छिपा है...
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आप का अपना नज़रिया होगा...होना भी चाहिए...
लेकिन मुझे नहीं लगता किसी की प्रताड़ना शक्ति के उस पुंज को आत्माहत्या के लिए विवश कर सकती है. प्रताडित करने वाले से लड़ने में वह सक्षम होगा, लेकिन लड़ इस लिए नहीं पाया क्योंकि उसके कंधों पर उम्मीदों का बोझ था. उसे डर लड़ाई हारने का नहीं, इन उम्मीदों के बिखर जाने का था. ये उम्मीदें, उसने खुद कंधों पर नहीं उठाईं थी, आप ने उसके कंधों पर लाद कर घर से भेजा था उसे. जब भी वह कॉलेज के दबाव से मन हल्का करने के लिए घर आता, आप उम्मीदों का बोझ थोड़ा और बढ़ा देते.
अब आप इसे मेरी कोरी कल्पना करार देने की कोशिश ना करिएगा क्योंकि इन उम्मीदों को ढोने की कोशिश मैं कर चुका हूँ. अपने दोस्तों, भाइयों और जिंदगी में टकराए न जाने कितने लोगों को झुके कंधों से इन उम्मीदों को ढोते देखा है मैने.
लेकिन मैं जानना चाहता हूँ आप सब ऐसा क्यों करते हैं. क्या पौधे कि मजबूरी है कि अगर आपने समय से उसे खाद और पानी दिया है तो वह आप को पुष्प और फल दे ही. क्या आप उसे आज़ाद नहीं छोड़ सकते जैसे जंगलों में उगने वाले पेड़ और पौधे आज़ाद होते हैं. उन्हें भी तो कोई खाद और पानी देता ही है ना. आप सब क्यों घर का सूनापन दूर करने, परिवार की ज़रूरत, सामाजिकता, बुढ़ापे की लाठी बनाने के लिए एक जीवन का सृजन कर बैठते हैं. क्या इस सृजन को भी आप फैक्टरी में तैयार उत्पाद के रूप में ही देखते हैं, जो आप की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए बनाया गया है.
मुझे पता है, आप उसे बेइंतेहा प्यार करते हैं, उसपर अपनी जिंदगी न्योछावर करने को तैयार हैं. उसकी आँखों से निकले एक आँसू के लिए आप दुनिया से लड़ जाने को तैयार हैं. फिर क्यों आप अपनी उम्मीदों को उसके गले का फंदा बनते नहीं देख पाते.
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अगर आप बिना किसी उम्मीद के ही पौधे को खाद और पानी देने में खुशी ढूढ़ लें तो इसी पौधे का पुष्प आपको आनंदित कर देगा, उसकी खुशबू आप के रोम रोम को खिला देगी (और फिर गीता में कृष्ण भी तो यही कहते हैं... मेरी नहीं तो उन्ही की मान लीजिए).
परमपिता की बगिया में अनंत प्रकार के फूल हर सुबह खिलते हैं. कोई अपनी खुशबू तो कोई सौंदर्य से अपनी पहचान बनाता है. आप इन फूलों को स्वच्छन्द भाव से खिलने दो. इनका मुकाम सिर्फ़ आपकी बालकनी नहीं पूरी दुनिया को महकाना है. आप तो माली की भूमिका को स्वीकार करो. और ईश्वर द्वारे बनाए इस रंगमंच में अपने किरदार को खुलकर जी लो...यही जीवन है...
इसी में सारा आनंद...परमानंद... स्वर्ग...जन्नत...मोक्ष सब छिपा है...
(*Parts of artwork have been borrowed from the internet, with due thanks to the owner of the photograph/art)
उजाले के लिए वह खुद बाती की तरह जले थे स्वामी रामकृष्ण परमहंस
19वीं सदी में हिंदू धर्म संक्रमण के दौर से गुजर रहा था। अंधविश्वास और कुरीतियां इसे बुरी तरह जकड़े हुए थीं। देश में तो हम इसका यशोगान कर रहे थे। लेकिन विदेशी धरती पर इसे हिकारत भरी नजरों से देखा जा रहा था। इसी दौर में एक गुरु धर्म के शुद्धीकरण के लिए प्रयासरत था. कुरीतियों की बेडि़यां कांटने और अंधविश्वास रूपी अंधकार को मिटाने के जतन कर रहा था। इसी जद्दोजहद के दौरान उसके पास एक युवा आया. उसकी ज्ञान की पिपासा देखकर इस गुरु की आंखें चमक उठी। गुरु ने खुद मूर्ति उपासक होते हुए भी उसे आत्मज्ञान के पथ पर अग्रसर होने के लिए प्रेरित किया. फिर क्या शिष्य ज्ञान की गहराइयों में गोते लगाने लगा. दर्शन, धर्म, जीवन के रहस्यों की गाठें खोलकर ऊचाईयाँ पाने लगा. वह समय भी आया जब गुरु दुनियाँ में नहीं रहे लेकिन उनका सपना फिर भी जीवित था.
उनका यह शिष्य 1893 में सात समंदर पार कर अमेरिका की धरती पर कदम रखता है। और उसका एक भाषण पश्चिम में हिंदू धर्म के प्रति व्याप्त तमाम भ्रांतियों को उखाड़ फेंकता है। जिनके दिलों में अब तक भारत और उसके सनातन धर्म के प्रति घृणा थी, आज उनमें करुणा के अंकुर फूट पड़ते हैं।
यह युवा कोई और नहीं, स्वामी विवेकानंद थे। उनके द्वारा जो ज्ञान का प्रकाश फैलाया गया उसमें अगर कोई बाती के रूप में जल रहा था तो वे थे स्वामी रामकृष्ण परमहंस।
कहते हैं स्वामी रामकृष्ण परमहंस न होते तो नरेंद्र कभी स्वामी विवेकानंद नहीं होते। यह संबंध कुछ वैसा ही था, जैसा दीपक, बाती और तेल में होता है। स्वामी विवेकानंद खुद को मिट्टी का छोटा दिया समझकर स्वामी रामकृष्ण परमहंस के पास पहुंचे। उन्होंने समर्पण रूपी तेल, बाती रूपी गुरु में उड़ेल दिया। फिर गुरु रामकृष्ण को तो बाती होकर जलना ही था।
(*Parts of artwork have been borrowed from the internet, with due thanks to the owner of the photograph/art)
उनका यह शिष्य 1893 में सात समंदर पार कर अमेरिका की धरती पर कदम रखता है। और उसका एक भाषण पश्चिम में हिंदू धर्म के प्रति व्याप्त तमाम भ्रांतियों को उखाड़ फेंकता है। जिनके दिलों में अब तक भारत और उसके सनातन धर्म के प्रति घृणा थी, आज उनमें करुणा के अंकुर फूट पड़ते हैं।
यह युवा कोई और नहीं, स्वामी विवेकानंद थे। उनके द्वारा जो ज्ञान का प्रकाश फैलाया गया उसमें अगर कोई बाती के रूप में जल रहा था तो वे थे स्वामी रामकृष्ण परमहंस।
कहते हैं स्वामी रामकृष्ण परमहंस न होते तो नरेंद्र कभी स्वामी विवेकानंद नहीं होते। यह संबंध कुछ वैसा ही था, जैसा दीपक, बाती और तेल में होता है। स्वामी विवेकानंद खुद को मिट्टी का छोटा दिया समझकर स्वामी रामकृष्ण परमहंस के पास पहुंचे। उन्होंने समर्पण रूपी तेल, बाती रूपी गुरु में उड़ेल दिया। फिर गुरु रामकृष्ण को तो बाती होकर जलना ही था।
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Bhangarh: Asia`s Most Haunted Place
भानगढ़ : एक सफ़र भूतियाना...
अपने देश में क्या दुनियाँ भर में भूत-प्रेत से जुड़ी बातों को सुनने और जानने का अलग ही क्रेज है। कोई इनसे डरता है, कोई नहीं डरता। कोई विश्वास करता है, कोई नहीं करता। लेकिन जानना और सुनना सभी चाहते हैं. आप किस्सा शुरू करो हर कोई आपको डूबकर सुनने को बेताब हो जाएगा.
तो हम भी दुनिया से अलग नहीं हैं।इन सबमें अपना भी ख़ासा इंटरेस्ट हैं. दिसंबर में अलवर आने से पहले ही भानगढ़ के बारे में काफ़ी कुछ सुना था. यहाँ आने बाद से ही भानगढ़ जाने की योजना बनने लग गई.
आज से करीब एक महीना पहले अगले दिन सुबह निकलने की तैयारी थी. प्लान फाइनल करने के एक घंटे बाद ही अचानक मुझे बुखार आ गया. अगले एक घंटे में मेरी हालत और खराब हो गई. फिर तीन रोज बुखार रहा. प्लान कैंसल होना ही था. इससे मन में एक आशंका ने भी घर कर लिया. इसके दो साप्ताह बाद फिर प्लान किया. बैग रेडी, केमरा बैटरी चार्ज्ड. सुबह 4.30 निकलना था. लेकिन हम फिर नहीं जा पाए. पहला प्लान फेल हुआ था, दूसरा भी हो गया. अब तो लगा कुछ तो खेल है भाई. क्या कोई रोक रहा है वहाँ जाने से....
तो हम भी दुनिया से अलग नहीं हैं।इन सबमें अपना भी ख़ासा इंटरेस्ट हैं. दिसंबर में अलवर आने से पहले ही भानगढ़ के बारे में काफ़ी कुछ सुना था. यहाँ आने बाद से ही भानगढ़ जाने की योजना बनने लग गई.
आज से करीब एक महीना पहले अगले दिन सुबह निकलने की तैयारी थी. प्लान फाइनल करने के एक घंटे बाद ही अचानक मुझे बुखार आ गया. अगले एक घंटे में मेरी हालत और खराब हो गई. फिर तीन रोज बुखार रहा. प्लान कैंसल होना ही था. इससे मन में एक आशंका ने भी घर कर लिया. इसके दो साप्ताह बाद फिर प्लान किया. बैग रेडी, केमरा बैटरी चार्ज्ड. सुबह 4.30 निकलना था. लेकिन हम फिर नहीं जा पाए. पहला प्लान फेल हुआ था, दूसरा भी हो गया. अब तो लगा कुछ तो खेल है भाई. क्या कोई रोक रहा है वहाँ जाने से....
खैर कल रात कोई पहले से प्लानिंग नहीं थी. रात ढाई बजे चाय पीते हुए अचानक मूड हुआ और दो घंटे बाद मैं और साथी Rajkamal Vyas निकल भी लिए.
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यहाँ आप जान लें कि राजस्थान के भानगढ़ किले को भूतिया किले के रूप में जाना जाता है. कुछ समय पूर्व एक टीवी चैनल ने इसे एशिया का most haunted place भी घोषित कर दिया. इंटरनेट से लेकर स्थानीय लोगों के पास तक इससे जुड़े डरावने क़िस्सों और कहानियों की भरमार है. यह तन्त्र साधना का एक केन्द्र भी माना जाता है. सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले यहाँ प्रवेश की मनाही है. इस अवधि में यहाँ न बंदर रुकते हैं न ही चारे की तलाश में आए मवेशी. रात को यहाँ चीखें और रोने की आवाज़े सुनी जाती हैं।
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हम सुबह साढ़े सात बजे पहुँच गए. इससे पहले रास्ते में देहाती चाय के साथ भैंस का ताज़ा कच्चा दूध पीकर बचपन की यादें ताज़ा की. राह में लोगों से भानगढ़ की कहानियाँ भी सुनी.
यहाँ पहुँचने के बाद किले के बहार बाइक पार्क की। बड़े ही रोमांच के साथ किले की चारदीवारी में प्रवेश किया. घुसते ही एक मंदिर है, यहाँ स्थानीय लोग पूजन-अर्चन के लिए आते हैं। आगे बढ़े, दिन था ऐसे में कुछ अप्रत्याशित घटने की आशंका कम ही थी. सामने ही किला दिख गया। इसे देख ऐसा लगा जैसे यह किसी त्रासदी का शिकार हो। अब यह खंडहर हो चुका है. कभी यहाँ बहुत संपन्न बाज़ार लगता था इसकी कहानी बयाँ करने को उसके अवशेष ही बांकी हैं. यहाँ के माहौल में अजब उदासी है. यह उदासी भूतिया अनुभूतियों से भी डरावनी लगी. कला की दृष्टि से सुरक्षा की दृष्टि से तैयार किया गया एक नायाब नमूना आज खंडहर में तब्दील हो चुका है. अब भी अंदर जाने की उत्किसुकता बरकरार थी।अंदर घुसते ही मायूसी के साथ उदासी बढ़ती गई। किले में ऊपर जाने के बाद उस जगह को जल्द से जल्द छोड़ने को जी कर रहा था. यहाँ जाने से पहले सबने भूतों की कहानी सुनाई थी लेकिन कोई उस वीरने की उदासी के बारे में एक लफ्ज़ भी न बोला था. यहाँ उदासी हवा में तैरती है।
इस दौरान हमने कुछ ऐसा भी देखा जिससे लगा यहाँ तंत्र साधना की जाती है. किले के अंधेरे में चिमगादड़ के झूण्डों की आवाज़ सच में डरावनी लगी.... लेकिन भूत अंकल से अपना सामना नहीं हुआ. खैर दिन भी था जब चिमगादड़ छिप कर बैठे थे तो वो भला चिलचिलाती धूप में हमसे मिलने क्यों आते. यहाँ सुरंग भी हैं, हो सकता है भूत अंकल वहाँ रेस्ट कर रहे हों पर उनमें घुसने की हिम्मत अपने में नहीं थी...
दोस्तों कुछ ऐसी रही अपनी भानगढ़ ट्रिप. आप भी घूमने जाइए क्या पता आपको वहाँ भूतों की मौजूदगी का अहसास हो जाए... अगर न भी हुआ तो कौन सा आप कहानी क़िस्सों पर विश्वास करना छोड़ देंगे... है कि नहीं....!
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यहाँ आप जान लें कि राजस्थान के भानगढ़ किले को भूतिया किले के रूप में जाना जाता है. कुछ समय पूर्व एक टीवी चैनल ने इसे एशिया का most haunted place भी घोषित कर दिया. इंटरनेट से लेकर स्थानीय लोगों के पास तक इससे जुड़े डरावने क़िस्सों और कहानियों की भरमार है. यह तन्त्र साधना का एक केन्द्र भी माना जाता है. सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले यहाँ प्रवेश की मनाही है. इस अवधि में यहाँ न बंदर रुकते हैं न ही चारे की तलाश में आए मवेशी. रात को यहाँ चीखें और रोने की आवाज़े सुनी जाती हैं।
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हम सुबह साढ़े सात बजे पहुँच गए. इससे पहले रास्ते में देहाती चाय के साथ भैंस का ताज़ा कच्चा दूध पीकर बचपन की यादें ताज़ा की. राह में लोगों से भानगढ़ की कहानियाँ भी सुनी.
यहाँ पहुँचने के बाद किले के बहार बाइक पार्क की। बड़े ही रोमांच के साथ किले की चारदीवारी में प्रवेश किया. घुसते ही एक मंदिर है, यहाँ स्थानीय लोग पूजन-अर्चन के लिए आते हैं। आगे बढ़े, दिन था ऐसे में कुछ अप्रत्याशित घटने की आशंका कम ही थी. सामने ही किला दिख गया। इसे देख ऐसा लगा जैसे यह किसी त्रासदी का शिकार हो। अब यह खंडहर हो चुका है. कभी यहाँ बहुत संपन्न बाज़ार लगता था इसकी कहानी बयाँ करने को उसके अवशेष ही बांकी हैं. यहाँ के माहौल में अजब उदासी है. यह उदासी भूतिया अनुभूतियों से भी डरावनी लगी. कला की दृष्टि से सुरक्षा की दृष्टि से तैयार किया गया एक नायाब नमूना आज खंडहर में तब्दील हो चुका है. अब भी अंदर जाने की उत्किसुकता बरकरार थी।अंदर घुसते ही मायूसी के साथ उदासी बढ़ती गई। किले में ऊपर जाने के बाद उस जगह को जल्द से जल्द छोड़ने को जी कर रहा था. यहाँ जाने से पहले सबने भूतों की कहानी सुनाई थी लेकिन कोई उस वीरने की उदासी के बारे में एक लफ्ज़ भी न बोला था. यहाँ उदासी हवा में तैरती है।
इस दौरान हमने कुछ ऐसा भी देखा जिससे लगा यहाँ तंत्र साधना की जाती है. किले के अंधेरे में चिमगादड़ के झूण्डों की आवाज़ सच में डरावनी लगी.... लेकिन भूत अंकल से अपना सामना नहीं हुआ. खैर दिन भी था जब चिमगादड़ छिप कर बैठे थे तो वो भला चिलचिलाती धूप में हमसे मिलने क्यों आते. यहाँ सुरंग भी हैं, हो सकता है भूत अंकल वहाँ रेस्ट कर रहे हों पर उनमें घुसने की हिम्मत अपने में नहीं थी...
दोस्तों कुछ ऐसी रही अपनी भानगढ़ ट्रिप. आप भी घूमने जाइए क्या पता आपको वहाँ भूतों की मौजूदगी का अहसास हो जाए... अगर न भी हुआ तो कौन सा आप कहानी क़िस्सों पर विश्वास करना छोड़ देंगे... है कि नहीं....!
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